इश्क़ के मुख़्बिर को अपना राज़-दाँ समझा था मैं

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोहीसयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही19 Aug 1919 – 3 Aug 2011

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इश्क़ के मुख़्बिर को अपना राज़-दाँ समझा था मैं

रहज़न-ए-मंज़िल को मीर-ए-कारवाँ समझा था में

तूर के क़िस्से को अपनी दास्ताँ समझा था मैं

बिजलियों के घर को अपना आशियाँ समझा था मैं

सुब्ह-ए-महशर बहर-ए-तज्दीद-ए-नमाज़-ए-ज़िंदगी

सूर-ए-इस्राफ़ील को बांग-ए-अज़ाँ समझा था मैं

आज मुझ पर ज़ुल्म ढाता है फ़लक बन कर वही

जिस को कल तक अपनी आहों का धुआँ समझा था मैं

आह ऐ शोर-ए-क़यामत क्या किया तू ने सितम

कुछ अभी राज़-ए-हयात-ए-जावेदाँ समझा था मैं

मर गया 'महमूद' तुझ को ढूँड कर ऐ ज़िंदगी

तू कहाँ आ कर मिली तुझ को कहाँ समझा था मैं

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
About the poet

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

उपनाम : 'क़ैसर' मूल नाम : सयय्द महमूद हसन जन्म : 19 Aug 1919 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Aug 2011 | दिल्ली, भारत

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