About Harivansh Rai Bachchan
Harivansh Rai Bachchan (27 November 1907 - 18 January 2003) was an Indian poet of the Nayi Kavita literary movement (romantic upsurge) of early 20th century Hindi literature. Born in an Awadhi Indian Hindu family of the Srivastava clan of the Kayastha caste, in the village of Babupatti, in the district of Pratapgarh,…
Selected Quotes
Poetry & Stories
अग्निपथ
वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,
कोई पार नदी के गाता!
कोई पार नदी के गाता!भंग निशा की नीरवता कर,
क्या है मेरी बारी में
क्या है मेरी बारी में।जिसे सींचना था मधुजल से
सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा
सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,डूबा, संध्या आई, छाई,
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
About Harivansh Rai Bachchan
Harivansh Rai Bachchan: Quick Answers
Who is Harivansh Rai Bachchan?
Harivansh Rai Bachchan (27 November 1907 - 18 January 2003) was an Indian poet of the Nayi Kavita literary movement (romantic upsurge) of early 20th century Hindi literature. Born in an Awadhi Indian Hindu family of the Srivastava clan of the Kayastha caste, in the village of Babupatti, in the district of Pratapgarh,…
When was Harivansh Rai Bachchan born?
Harivansh Rai Bachchan was born on 27 November 1907.
Where can I read Harivansh Rai Bachchan's poetry?
Kavishala has 64 poems and stories by Harivansh Rai Bachchan, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Harivansh Rai Bachchan
अग्निपथ
वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,
कोई पार नदी के गाता!
कोई पार नदी के गाता!भंग निशा की नीरवता कर,
क्या है मेरी बारी में
क्या है मेरी बारी में।जिसे सींचना था मधुजल से
सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा
सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,डूबा, संध्या आई, छाई,
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
सोचा करता बैठ अकेले
सोचा करता बैठ अकेले,गत जीवन के सुख-दुख झेले,
आत्म परिचय
आत्म परिचयमैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
मैं कल रात नहीं रोया था
मैं कल रात नहीं रोया थादुख सब जीवन के विस्मृत कर,
नीड़ का निर्माण फिर-फिर
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!जब रजनी के सूने क्षण में,
उन्मत्त
इतने मत उन् मत् त बनो!जीवन मधुशाला से मधु पी
स्वप्न था मेरा भयंकर
स्वप्न था मेरा भयंकर!रात का-सा था अंधेरा,
Selected Quotes by Harivansh Rai Bachchan (चुनिंदा उद्धरण)
आत्म परिचयमैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!सोचा करता बैठ अकेले,गत जीवन के सुख-दुख झेले,कोई पार नदी के गाता!भंग निशा की नीरवता कर,सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,डूबा, संध्या आई, छाई,Videos on Harivansh Rai Bachchan
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