शायद कि बहार आई - नज़्म

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोहीसयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही19 Aug 1919 – 3 Aug 2011

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आह-ए-दिल-ए-मुज़्तर की तासीर नज़र आई

क्या ख़्वाब-ए-मोहब्बत की ता'बीर नज़र आई

बर्बादी-ए-इंसाँ की तस्वीर नज़र आई

तहज़ीब के क़ुरआन की तफ़्सीर नज़र आई

शायद कि बहार आई

जाँबाज़-ए-मोहब्बत को क्या हुस्न का मंशा है

जीने की इजाज़त है मरने का इशारा है

इज़हार-ए-हक़ीक़त पर ता'ज़ीर का धड़का है

फिर तौक़ नज़र आया ज़ंजीर नज़र आई

फिर जोशिश-ए-वहशत ने की सिलसिला-जुम्बानी

फिर वक़्त की मौजें हैं आमादा-ए-तुग़्यानी

फिर हुस्न को सूझी है क्या मश्क़-ए-सितम-रानी

नाज़ुक सी कलाई में शमशीर नज़र आई

तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का उल्टा है वरक़ 'क़ैसर'

हिलता है दिल-ए-गीती लर्ज़ां हैं तबक़ 'क़ैसर'

इंसाँ का लहू पीने फूली है शफ़क़ क़ैसर

अब वक़्त के माथे की तहरीर नज़र आई

शायद कि बहार आई

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
About the poet

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

उपनाम : 'क़ैसर' मूल नाम : सयय्द महमूद हसन जन्म : 19 Aug 1919 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Aug 2011 | दिल्ली, भारत

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