About Raskhan
Syed Ibrahim Khan (born 1548 A.D.) was a poet of Pashtun origins, who became a devotee of Lord Krishna. He is known to have lived in Amroha, India. Raskhan was his takhallus in Hindi. In his early years, he became a follower of Lord Krishna and learned the bhakti marga from Goswami Vitthalnath and began living in Brin…
Selected Quotes
Poetry & Stories
वही रसखान
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
या लकुटी
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
सेस गनेस महेस
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
धूरि भरे अति शोभित श्याम
धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
कानन दै अँगुरी रहिहौं
कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।मोहिनि तानन सों रसखान, अटा चढ़ि गोधुन गैहै पै गैहै॥
About Raskhan
Raskhan: Quick Answers
Who is Raskhan?
Syed Ibrahim Khan (born 1548 A. D.
When was Raskhan born?
Raskhan was born on 1 January 1548.
Where can I read Raskhan's poetry?
Kavishala has 21 poems and stories by Raskhan, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Raskhan
वही रसखान
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
या लकुटी
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
सेस गनेस महेस
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
धूरि भरे अति शोभित श्याम
धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
कानन दै अँगुरी रहिहौं
कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।मोहिनि तानन सों रसखान, अटा चढ़ि गोधुन गैहै पै गैहै॥
मोरपखा मुरली बनमाल
मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
कर कानन कुंडल
कर कानन कुंडल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजती हैमुरली कर में अधरा मुस्कानी तरंग महाछबि छाजती है
मोरपखा सिर ऊपर
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी।।
गावैं गुनी गनिका गन्धर्व
गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।
संकर से सुर
संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।
प्रान वही जु रहैं रिझि
प्रान वही जु रहैं रिझि वापर, रूप वही जिहिं वाहि रिझायो।सीस वही जिहिं वे परसे पग, अंग वही जिहीं वा परसायो
प्रेम प्रेम सब
प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥
Selected Quotes by Raskhan (चुनिंदा उद्धरण)
धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।मोहिनि तानन सों रसखान, अटा चढ़ि गोधुन गैहै पै गैहै॥प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥Videos on Raskhan
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