मेरे पास
मंगतों-सी सड़क पर परेशान करती
अर्धविक्षिप्तों की कथाओं
और दुःस्वप्नों के विश्लेषणपरक लेखों के अलावा
कुछ नहीं है—मेरे गाथाकार
तुम मेरे इश्क़ का क़िस्सा सुनाते आए हो,
तुम मेरे इश्क़ का क़िस्सा, अब, कैसे सुनाओगे!
कैसे सुनाओगे उस रात की हाय-हाय,
जब मेरे महबूब की उँगली, पिरामिड के
उस तिकोने पत्थर ने कुचल दी थी—
भच्च!!
चाँद का हाला तड़क गया था—
कच्च!!
मेरे इश्क़ के क़िस्से में,
क्या शाही हँसी का बयान नहीं होगा—अतिशयोक्तिपूर्ण!








