Sharad Joshi, poet
Sootradhar · Author

Sharad Joshi

21 May 1931 – 5 September 1991Ujjain MP

  • 8 Poems & Stories
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About Sharad Joshi

Sharad Joshi was a Hindi poet, writer, satirist and a dialogue and scriptwriter in Hindi films and television. He was awarded the Padma Shri in 1990. Sharad Joshi has written many satirical essays on political, social, cultural and economical topics, such as Atha Shri Ganeshaya Namah , Billiyon ka Artha Shastra , Budd…

Selected Quotes

जो लिखेगा सो दिखेगा, जो दिखेगा सो बिकेगा-यही जीवन का मूल मंत्र है.
— Sharad Joshi
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इमर्जेंसी के दौर में जो पशु न्याय की तलाश में शेर की गुफा में घुसा उसका अंतिम फैसला कितनी शीघ्रता से हुआ इसे सब जानते हैं.
— Sharad Joshi
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Poetry & Stories

  1. शरद जोशी के व्यंग्य के कुछ:

    1. भारतीय रेल हमें मृत्यु का दर्शन समझाती है और अक्सर पटरी से उतरकर उसकी महत्ता का भी अनुभव करा देती है. कोई नहीं कह सकता कि रेल में चढ़ने के बाद वह कहां उतरेगा? अस्पताल में या श्मसान में. लोग रेलों की आलोचना करते हैं.2. नेताओं पर व्यंग्य करते हुए शरद लिखते हैं, 'उनका नमस्कार एक कांटा है, जो वे बार-बार वोटरों के तालाब में डालते हैं और मछलियां फंसाते हैं. उनका प्रणाम एक चाबुक है, हंटर है जिससे वे सबको घायल कर रहे हैं.'

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  2. 1968-69 के वे दिन / शरद जोशी

    आज से सौ वर्ष पहले अर्थात 1969 के वर्ष में सामान् य व् यक्ति का जीवन इतना कठिन नहीं था जितना आज है। न ऐसी महँगाई थी और न रुपयों की इतनी किल् लत। सौ वर्ष पूर्व यानी लगभग 1968 से 1969 के काल की आर्थिक स्थिति संबंधी जो सामग्री आज उपलब् ध है उसके आधार पर जिन तथ् यों का पता चलता है वे सचमुच रोचक हैं। यह सच है कि आम आदमी का वेतन कम था और आय के साधन सीमित थे पर वह संतोष का जीवन बिताता था और कम रुपयों में उसकी जरूरतें पूरी हो जाती थीं।जैसे एक रुपये में एक किलो गेहूँ या गेहूँ का आटा आ जाता था और पूरे क्विण् टल गेहूँ का दाम सौ रुपये से कुछ ही ज् यादा था। एक सौ बीस रुपये में अच् छा क् वालिटी गेहूँ बाज़ार में मिल जाता है। शरबती, कठिया, पिस् सी के अलावा भी कई तरह का गेहूँ बाज़ार में नज़र आता था। दालें रुपये में किलो भर मिल जाती थीं। घी दस-बारह से पंद्रह तक में किलो भर आ जाता था और तेल इससे भी सस् ता पड़ता था। आम आदमी डालडा खाकर संतोष करता था जिसके तैयार पैकबंद डिब् बे अधिक महँगे नहीं पड़ते थे। सिर्फ़ अनाज और तेल ही नहीं, हरी सब्जि़यों की भी बहुतायत थी। पाँच रुपया हाथ में लेकर गया व् यक्ति अपने परिवार के लिए दो टाइम की सब् ज़ी लेकर आ जाता था। आने-जाने के लिए तब सायकिल नामक वाहन का चलन था जो दो सौ-तीन सौ रुपयों में नयी मिल जाती थी। छह ह ज़ार में स् कूटर और सोलह से पच् चीस-तीस हज़ार में कारें मिल जाती थीं। पर ज् ़यादातर लोग बसों से जाते-आते थे, जिस पर बीस-तीस पैसा से अधिक ख़र्च नहीं बैठता था। निश्चित ही आज की तुलना में तब का भारत सचमुच स् वर्ग था।

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  3. जिसके हम मामा हैं

    एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।

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  4. लक्ष्य की रक्षा

    एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं। खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी- अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ। रेस आरंभ हुई। खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल।जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा। उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गंभीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है। यह कहकर वह सो गया। कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा।

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  5. प्रगति के चरण

    राजा भरत ने अपने राज्य की प्रगति की सालाना रिपोर्ट पढ़ते हुए कहा- जैसा कि हमारा लक्ष्य था कि इस देश में दूध और दही की नदियां बहने लगे, वह चालू वर्ष में पूरा हो गया और आपने देखा होगा कि दूध और दही की नदियां बह रही थीं। पर इसी बीच देश को एक भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा कि दूध और दही की ये नदियां किसी टेक्नीकल गलती के परिणामस्वरूप आगे जाकर परस्पर मिल गईं। नतीजा यह हुआ कि दही में मिलने से दूध की नदी भी जम गई और फट जाने के कारण दूध पीने लायक नहीं रहा। अब हमारे सामने समस्या है कि इस सड़े दही को, जिसकी दुर्गंध के कारण जनता को बड़ा कष्ट हो रहा है, किस प्रकार साफ करवाया जाए। हमने इस कार्य के लिए विदेश से मदद मांगी है ।

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