About Sharad Joshi
Sharad Joshi was a Hindi poet, writer, satirist and a dialogue and scriptwriter in Hindi films and television. He was awarded the Padma Shri in 1990. Sharad Joshi has written many satirical essays on political, social, cultural and economical topics, such as Atha Shri Ganeshaya Namah , Billiyon ka Artha Shastra , Budd…
Selected Quotes
Poetry & Stories
शरद जोशी के व्यंग्य के कुछ:
1. भारतीय रेल हमें मृत्यु का दर्शन समझाती है और अक्सर पटरी से उतरकर उसकी महत्ता का भी अनुभव करा देती है. कोई नहीं कह सकता कि रेल में चढ़ने के बाद वह कहां उतरेगा? अस्पताल में या श्मसान में. लोग रेलों की आलोचना करते हैं.2. नेताओं पर व्यंग्य करते हुए शरद लिखते हैं, 'उनका नमस्कार एक कांटा है, जो वे बार-बार वोटरों के तालाब में डालते हैं और मछलियां फंसाते हैं. उनका प्रणाम एक चाबुक है, हंटर है जिससे वे सबको घायल कर रहे हैं.'
1968-69 के वे दिन / शरद जोशी
आज से सौ वर्ष पहले अर्थात 1969 के वर्ष में सामान् य व् यक्ति का जीवन इतना कठिन नहीं था जितना आज है। न ऐसी महँगाई थी और न रुपयों की इतनी किल् लत। सौ वर्ष पूर्व यानी लगभग 1968 से 1969 के काल की आर्थिक स्थिति संबंधी जो सामग्री आज उपलब् ध है उसके आधार पर जिन तथ् यों का पता चलता है वे सचमुच रोचक हैं। यह सच है कि आम आदमी का वेतन कम था और आय के साधन सीमित थे पर वह संतोष का जीवन बिताता था और कम रुपयों में उसकी जरूरतें पूरी हो जाती थीं।जैसे एक रुपये में एक किलो गेहूँ या गेहूँ का आटा आ जाता था और पूरे क्विण् टल गेहूँ का दाम सौ रुपये से कुछ ही ज् यादा था। एक सौ बीस रुपये में अच् छा क् वालिटी गेहूँ बाज़ार में मिल जाता है। शरबती, कठिया, पिस् सी के अलावा भी कई तरह का गेहूँ बाज़ार में नज़र आता था। दालें रुपये में किलो भर मिल जाती थीं। घी दस-बारह से पंद्रह तक में किलो भर आ जाता था और तेल इससे भी सस् ता पड़ता था। आम आदमी डालडा खाकर संतोष करता था जिसके तैयार पैकबंद डिब् बे अधिक महँगे नहीं पड़ते थे। सिर्फ़ अनाज और तेल ही नहीं, हरी सब्जि़यों की भी बहुतायत थी। पाँच रुपया हाथ में लेकर गया व् यक्ति अपने परिवार के लिए दो टाइम की सब् ज़ी लेकर आ जाता था। आने-जाने के लिए तब सायकिल नामक वाहन का चलन था जो दो सौ-तीन सौ रुपयों में नयी मिल जाती थी। छह ह ज़ार में स् कूटर और सोलह से पच् चीस-तीस हज़ार में कारें मिल जाती थीं। पर ज् ़यादातर लोग बसों से जाते-आते थे, जिस पर बीस-तीस पैसा से अधिक ख़र्च नहीं बैठता था। निश्चित ही आज की तुलना में तब का भारत सचमुच स् वर्ग था।
जिसके हम मामा हैं
एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।
लक्ष्य की रक्षा
एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं। खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी- अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ। रेस आरंभ हुई। खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल।जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा। उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गंभीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है। यह कहकर वह सो गया। कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा।
प्रगति के चरण
राजा भरत ने अपने राज्य की प्रगति की सालाना रिपोर्ट पढ़ते हुए कहा- जैसा कि हमारा लक्ष्य था कि इस देश में दूध और दही की नदियां बहने लगे, वह चालू वर्ष में पूरा हो गया और आपने देखा होगा कि दूध और दही की नदियां बह रही थीं। पर इसी बीच देश को एक भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा कि दूध और दही की ये नदियां किसी टेक्नीकल गलती के परिणामस्वरूप आगे जाकर परस्पर मिल गईं। नतीजा यह हुआ कि दही में मिलने से दूध की नदी भी जम गई और फट जाने के कारण दूध पीने लायक नहीं रहा। अब हमारे सामने समस्या है कि इस सड़े दही को, जिसकी दुर्गंध के कारण जनता को बड़ा कष्ट हो रहा है, किस प्रकार साफ करवाया जाए। हमने इस कार्य के लिए विदेश से मदद मांगी है ।
About Sharad Joshi
Sharad Joshi was a Hindi poet, writer, satirist and a dialogue and scriptwriter in Hindi films and television. He was awarded the Padma Shri in 1990.
Sharad Joshi has written many satirical essays on political, social, cultural and economical topics, such as Atha Shri Ganeshaya Namah, Billiyon ka Artha Shastra, Buddhijivi, Sahitya ka Mahabali, Adhyaksha Mahodaya
Sharad Joshi also wrote satirical plays. His plays Ek Tha Gadha Urf Aladad Khan and Andhon Ka Haathi are popular for satire and timeless humour
His books and essay collections include Parikrama, Kisi Bahane, Tilasm, Jeep par Sawar Illian, Raha Kinare Baith, Meri Shreshth Rachnaye, Dusri Satah, Yatha Sambhav, Yatra Tatra Sarvatra, Yatha Samay, Ham Bhrashtan ke Bhrasht Hamare, and Pratidin
Filmography as dialogue writer
- Kshitij (1974)
- Chhoti Si Baat (1975)
- Sanch Ko Anch Nahin (1979)
- Godhuli (1977)
- Chorni (1982)
- Utsav (1984)
- Mera Damad (1990)
- Dil Hai Ki Manta Nahin (1991)
- Udaan (1997)
TV serials[edit]
- Yeh Jo Hai Zindagi (1984–85)
- Vikram Aur Betal
- Wah Janaab (1984)
- Dane Anar Ke
- Shrimati ji
- Sinhasan Battisie
- Yeh Duniyan Gazab Ki[10]
- Pyale Mai Toofan
- Guldasta
- Lapataganj (2009)
Sharad Joshi: Quick Answers
Who is Sharad Joshi?
Sharad Joshi was a Hindi poet, writer, satirist and a dialogue and scriptwriter in Hindi films and television. He was awarded the Padma Shri in 1990.
When was Sharad Joshi born?
Sharad Joshi was born on 21 May 1931. Associated place: Ujjain MP.
When did Sharad Joshi die?
Sharad Joshi passed away on 5 September 1991.
Where can I read Sharad Joshi's poetry?
Kavishala has 8 poems and stories by Sharad Joshi, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Sharad Joshi
शरद जोशी के व्यंग्य के कुछ:
1. भारतीय रेल हमें मृत्यु का दर्शन समझाती है और अक्सर पटरी से उतरकर उसकी महत्ता का भी अनुभव करा देती है. कोई नहीं कह सकता कि रेल में चढ़ने के बाद वह कहां उतरेगा? अस्पताल में या श्मसान में. लोग रेलों की आलोचना करते हैं.2. नेताओं पर व्यंग्य करते हुए शरद लिखते हैं, 'उनका नमस्कार एक कांटा है, जो वे बार-बार वोटरों के तालाब में डालते हैं और मछलियां फंसाते हैं. उनका प्रणाम एक चाबुक है, हंटर है जिससे वे सबको घायल कर रहे हैं.'
1968-69 के वे दिन / शरद जोशी
आज से सौ वर्ष पहले अर्थात 1969 के वर्ष में सामान् य व् यक्ति का जीवन इतना कठिन नहीं था जितना आज है। न ऐसी महँगाई थी और न रुपयों की इतनी किल् लत। सौ वर्ष पूर्व यानी लगभग 1968 से 1969 के काल की आर्थिक स्थिति संबंधी जो सामग्री आज उपलब् ध है उसके आधार पर जिन तथ् यों का पता चलता है वे सचमुच रोचक हैं। यह सच है कि आम आदमी का वेतन कम था और आय के साधन सीमित थे पर वह संतोष का जीवन बिताता था और कम रुपयों में उसकी जरूरतें पूरी हो जाती थीं।जैसे एक रुपये में एक किलो गेहूँ या गेहूँ का आटा आ जाता था और पूरे क्विण् टल गेहूँ का दाम सौ रुपये से कुछ ही ज् यादा था। एक सौ बीस रुपये में अच् छा क् वालिटी गेहूँ बाज़ार में मिल जाता है। शरबती, कठिया, पिस् सी के अलावा भी कई तरह का गेहूँ बाज़ार में नज़र आता था। दालें रुपये में किलो भर मिल जाती थीं। घी दस-बारह से पंद्रह तक में किलो भर आ जाता था और तेल इससे भी सस् ता पड़ता था। आम आदमी डालडा खाकर संतोष करता था जिसके तैयार पैकबंद डिब् बे अधिक महँगे नहीं पड़ते थे। सिर्फ़ अनाज और तेल ही नहीं, हरी सब्जि़यों की भी बहुतायत थी। पाँच रुपया हाथ में लेकर गया व् यक्ति अपने परिवार के लिए दो टाइम की सब् ज़ी लेकर आ जाता था। आने-जाने के लिए तब सायकिल नामक वाहन का चलन था जो दो सौ-तीन सौ रुपयों में नयी मिल जाती थी। छह ह ज़ार में स् कूटर और सोलह से पच् चीस-तीस हज़ार में कारें मिल जाती थीं। पर ज् ़यादातर लोग बसों से जाते-आते थे, जिस पर बीस-तीस पैसा से अधिक ख़र्च नहीं बैठता था। निश्चित ही आज की तुलना में तब का भारत सचमुच स् वर्ग था।
जिसके हम मामा हैं
एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।
लक्ष्य की रक्षा
एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं। खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी- अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ। रेस आरंभ हुई। खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल।जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा। उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गंभीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है। यह कहकर वह सो गया। कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा।
प्रगति के चरण
राजा भरत ने अपने राज्य की प्रगति की सालाना रिपोर्ट पढ़ते हुए कहा- जैसा कि हमारा लक्ष्य था कि इस देश में दूध और दही की नदियां बहने लगे, वह चालू वर्ष में पूरा हो गया और आपने देखा होगा कि दूध और दही की नदियां बह रही थीं। पर इसी बीच देश को एक भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा कि दूध और दही की ये नदियां किसी टेक्नीकल गलती के परिणामस्वरूप आगे जाकर परस्पर मिल गईं। नतीजा यह हुआ कि दही में मिलने से दूध की नदी भी जम गई और फट जाने के कारण दूध पीने लायक नहीं रहा। अब हमारे सामने समस्या है कि इस सड़े दही को, जिसकी दुर्गंध के कारण जनता को बड़ा कष्ट हो रहा है, किस प्रकार साफ करवाया जाए। हमने इस कार्य के लिए विदेश से मदद मांगी है ।
नेतृत्व की ताकत
नेता शब्द दो अक्षरों से बना है। ने और ता । इनमें एक भी अक्षर कम हो, तो कोई नेता नहीं बन सकता। मगर हमारे शहर के एक नेता के साथ अजीब ट्रेजडी हुई। एक दिन यह हुआ कि उनका ता खो गया। सिर्फ ने रह गया। इतने बड़े नेता और ता गायब। उन्हें सेक्रेटरी ने बताया कि सर आपका ता नहीं मिल रहा। आप सिर्फ ने से काम चला रहे हैं। नेता बड़े परेशान। नेता का मतलब होता है, नेतृत्व करने की ताकत। ताकत चली गई, सिर्फ नेतृत्व रह गया। ता के साथ ताकत गई। तालियां गईं, जो ता के कारण बजती थीं। नेता बहुत चीखे। पर जिसका ता चला गया, उस नेता की सुनता कौन है? खूब जांच हुई पर ता नहीं मिला। नेता ने एक सेठ से कहा, यार हमारा ता गायब है। अपने ताले में से ता हमें दे दो। सेठ बोला, यह सच है कि ले की मुझे जरूरत रहती है, क्योंकि दे का तो काम नहीं पड़ता, मगर ताले का ता चला जाएगा तो लेकर रखेंगे कहां? सब इनकम टैक्स वाले ले जाएंगे। कभी तालाबंदी करनी पड़ी तो? ऐसे वक्त तू तो मजदूरों का साथ देगा। मुझे ता थोड़े देगा। नेता ने सेठ को बहुत समझाया। जब तक नेता रहूंगा, मेरा ता आपके ताले का समर्थन करेगा। आप ता मुझे दे दें और फिर ले आपका। लेते रहिए, मैं कुछ नहीं कहूंगा। सेठ जी नहीं माने। विरोधी मजाक बनाने लगे। अखबारों में खबर उछली कि नेता का ता नहीं रहा। अगर ने भी चला गया तो यह कहीं का नहीं रहेगा। खुद नेता के दल के लोगों ने दिल्ली जाकर शिकायत की। आपने एक ऐसा नेता हमारे सिर थोप रखा है, जिसके पास ता नहीं है।नेता दुखी था पर उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह जनता के पास जाए और कबूल करे कि उसमें ता नहीं है। एक दिन उसने अजीब काम किया। कमरा बंद कर जूता में से ता निकाला और ने से चिपकाकर फिर नेता बन गया। यद्यपि उसके व्यक्तित्व से दुर्गन्ध आ रही थी। मगर वह खुश था कि चलो नेता तो हूं। पार्टी ने भी कहा, जो भी नेता है, ठीक है। समस्या सिर्फ यह रह गई कि लोगों को पता चल गया। आज स्थिति यह है कि लोग नेता को देखते हैं और अपना जूता हाथ में उठा लेते हैं। उन्हें डर है कि कहीं वह इनके जूतों में से ता ना चुरा ले। पत्रकार पूछते हैं, सुना आपका ता गायब हो गया था? वह धीरे से कहते हैं, गायब नहीं हुआ था। माताजी को चाहिए था तो मैंने दे दिया। आज मैं जो भी हूं, उनके ही कारण हूं। वह ता क्या मेरा ने भी ले लें तो मैं इनकार नहीं करूंगा। नेता की नम्रता देखते ही बनती है। लेकिन मेरा विश्वास है मित्रो जब भी संकट आएगा, नेता का ता नहीं रहेगा, लोग निश्चित ही जूता हाथ में ले बढ़ेंगे और प्रजातंत्र की प्रगति में अपना योगदान देंगे।
परंपरा की रक्षा
पार्टी दफ्तर में हनुमान, अंगद, सुग्रीव, जामवन्त आदि सारे विधायकों को लिए राम अपनी पार्टी की सूची बना रहे थे। सभी तरफ से हिसाब लगाकर देखा लेकिन पार्टी बहुमत में नहीं आती थी। राम ने लंबी सांस ली और कहा, विभीषण होता तो ऐसे वक्त पर डिफेक्ट कर के आ जाता।
शेर की गुफा में न्याय
जंगल में शेर के उत्पात बहुत बढ़ गए थे. जीवन असुरक्षित था और बेहिसाब मौतें हो रही थीं. शेर कहीं भी, किसी पर हमला कर देता था. इससे परेशान हो जंगल के सारे पशु इकट्ठा हो वनराज शेर से मिलने गए. शेर अपनी गुफा से बाहर निकला कहिए क्या बात है?उन सबने अपनी परेशानी बताई और शेर के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई. शेर ने अपने भाषण में कहा
Selected Quotes by Sharad Joshi (चुनिंदा उद्धरण)
जो लिखेगा सो दिखेगा, जो दिखेगा सो बिकेगा-यही जीवन का मूल मंत्र है.इमर्जेंसी के दौर में जो पशु न्याय की तलाश में शेर की गुफा में घुसा उसका अंतिम फैसला कितनी शीघ्रता से हुआ इसे सब जानते हैं.एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।आपने एक ऐसा नेता हमारे सिर थोप रखा है, जिसके पास ता नहीं है।कुछ स्त्रियों के कुँवारी रहकर जीवन बिताने के भी प्रमाण मिलते हैं।Videos on Sharad Joshi
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