About Namvar Singh
Namvar Singh (28 July 1926 – 19 February 2019) was an Indian literary critic, linguist, academician and theoretician. He received his doctorate degree from Banaras Hindu University where he also taught for some time. He served as a professor of Hindi literature in several other universities. He was the founder and fir…
Selected Quotes
Poetry & Stories
पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवाल
पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवालचाँद था, हम थे, हिला तुमने दिया भर ताल
विजन गिरीपथ पर
विजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लासहृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हास
धुन्धुवाता अलाव
धुन्धुवाता अलाव, चौतरफ़ा मोढ़ा मचियापड़े गुड़गुड़ाते हुक्का कुछ खींच मिरजई
आज तुम्हारा जन्मदिवस
आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्याभी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका
मँह-मँह बेल कचेलियाँ,
मँह-मँह बेल कचेलियाँ, माधव माससुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
About Namvar Singh
Books
- Kavita Ke Naye Pratiman ISBN 978-8-1267-0744-7[6]
- Chhayavaad ISBN 978-8-1267-0736-2[6]
- Dusari Parampara Ki khoj ISBN 978-8-1267-1591-6[6]
- Itihaas Aur Alochana ISBN 978-8-1267-0510-8
Namvar Singh: Quick Answers
Who is Namvar Singh?
Namvar Singh (28 July 1926 – 19 February 2019) was an Indian literary critic, linguist, academician and theoretician. He received his doctorate degree from Banaras Hindu University where he also taught for some time.
When was Namvar Singh born?
Namvar Singh was born on 28 July 1926.
When did Namvar Singh die?
Namvar Singh passed away on 19 February 2019.
Where can I read Namvar Singh's poetry?
Kavishala has 13 poems and stories by Namvar Singh, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Namvar Singh
पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवाल
पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवालचाँद था, हम थे, हिला तुमने दिया भर ताल
विजन गिरीपथ पर
विजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लासहृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हास
धुन्धुवाता अलाव
धुन्धुवाता अलाव, चौतरफ़ा मोढ़ा मचियापड़े गुड़गुड़ाते हुक्का कुछ खींच मिरजई
आज तुम्हारा जन्मदिवस
आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्याभी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका
मँह-मँह बेल कचेलियाँ,
मँह-मँह बेल कचेलियाँ, माधव माससुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
पथ में साँझ
पथ में साँझपहाड़ियाँ ऊपर
उनये उनये भादरे
उनये उनये भादरेबरखा की जल चादरें
दोस्त, देखते हो जो तुम
दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध-सामेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है ।
पकते गुड़ की गरम गन्ध से
पकते गुड़ की गरम गन्ध से सहसा आयामीठा झोंका। आह, हो गई कैसी दुनिया।
नभ के नीले सूनेपन में
नभ के नीले सूनेपन मेंहैं टूट रहे बरसे बादर
दिन बीता
दिन बीता,पर नहीं बीतती,
कभी जब याद आ जाते
कभी जब याद आ जातेनयन को घेर लेते घन,
Selected Quotes by Namvar Singh (चुनिंदा उद्धरण)
आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्याभी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सकाधुन्धुवाता अलाव, चौतरफ़ा मोढ़ा मचियापड़े गुड़गुड़ाते हुक्का कुछ खींच मिरजईदोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध-सामेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है ।नभ के नीले सूनेपन मेंहैं टूट रहे बरसे बादरविजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लासहृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हासउनये उनये भादरेबरखा की जल चादरेंVideos on Namvar Singh
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