About Kavi Gang
Kavi Ganga or 'Gang Kavi' (1538 -1625 AD) was the first important (Hindi) poet of the ritual poetry tradition. His real name was Gangadhar. He was the court poet of Akbar. Birth, date of birth and birthplace are controversial. By the way, they are called Bhat Rao of Iknaur (district Etawah).
Selected Quotes
Poetry & Stories
फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट
फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट,काहू घाट मोल काहू बाढ़ मोल को लयो।
उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी
उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी ,नेसुक देखाय मुख दूनो दुख दै गई ।
मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै
मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही।सुचि चीकनी चारु चुभी चित में, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥
करि कै जु सिंगार अटारी चढी
करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो।सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥
लहसुन गाँठ कपूर के नीर में
लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई।केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥
About Kavi Gang
Kavi Gang: Quick Answers
Who is Kavi Gang?
Kavi Ganga or 'Gang Kavi' (1538 -1625 AD) was the first important (Hindi) poet of the ritual poetry tradition. His real name was Gangadhar.
When was Kavi Gang born?
Kavi Gang was born on 1 January 1538.
When did Kavi Gang die?
Kavi Gang passed away on 1 January 1625.
Where can I read Kavi Gang's poetry?
Kavishala has 16 poems and stories by Kavi Gang, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Kavi Gang
फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट
फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट,काहू घाट मोल काहू बाढ़ मोल को लयो।
उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी
उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी ,नेसुक देखाय मुख दूनो दुख दै गई ।
मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै
मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही।सुचि चीकनी चारु चुभी चित में, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥
करि कै जु सिंगार अटारी चढी
करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो।सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥
लहसुन गाँठ कपूर के नीर में
लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई।केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥
रती बिन साधु, रती बिन संत
रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको।
अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै
अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥कवि 'गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की।
चकित भँवरि रहि गयो
चकित भँवरि रहि गयो, गम नहिं करत कमलवन,अहि फन मनि नहिं लेत, तेज नहिं बहत पवन वन।
बैठी थी सखिन सँग
बैठी थी सखिन सँग,पिय को गवन सुन्यौ ,सुख के समूह में बियोग आगि भरकी.
झुकत कृपान मयदान
झुकत कृपान मयदान ज्यों उदोत भान,एकन ते एक मान सुषमा जरद की.
देखत कै वृच्छन में दीरघ
देखत कै वृच्छन में दीरघ सुभायमान,कीर चल्यो चाखिबे को प्रेम जिय जग्यो है.
तारों के तेज में चन्द्र छिपे नहीं
तारों के तेज में चन्द्र छिपे नहींसूरज छिपे नहीं बादल छायो
Selected Quotes by Kavi Gang (चुनिंदा उद्धरण)
तारों के तेज में चन्द्र छिपे नहींसूरज छिपे नहीं बादल छायोमृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही।सुचि चीकनी चारु चुभी चित में, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको।चकित भँवरि रहि गयो, गम नहिं करत कमलवन,अहि फन मनि नहिं लेत, तेज नहिं बहत पवन वन।लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई।केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो।सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥Videos on Kavi Gang
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