देहात - नज़्म

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोहीसयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही19 Aug 1919 – 3 Aug 2011

1 min read · 12.4K reads

उफ़ वो जमुना के क़रीं देहात का दिलकश समाँ

ऊँची-नीची सी वो दीवारें वो कुछ टूटे मकाँ

रश्क हो फ़िरदौस को नक़्शा है वो देहात का

सब्ज़ काही की बहार और वो समाँ बरसात का

आसमाँ करता है शब-भर गौहर-ए-अंजुम निसार

फूल करती है निछावर हर सहर बाद-ए-बहार

वो रविश खेतों की जिस पर तख़्ता-ए-जन्नत निसार

क्यारियाँ वो दिलरुबा हो जल्वा-ए-फ़ितरत निसार

शहर की ठंडी हवा से नख़्ल था हर इक निहाँ

थी ख़स-ओ-ख़ाशाक पानी पर कि आईने पे बाल

सब्ज़ धानों का वो ता-हद्द-ए-नज़र इक सिलसिला

वो घने पौदे नज़र को थी न तिल रखने की जा

थी बनफ़शा सत्ह पर पानी की यूँ आई हुई

ज़ुल्फ़ हो जिस तरह आईने पे लहराई हुई

उफ़ वो सन्नाटा वो ख़ामोशी फ़ज़ा की मुत्तसिल

खड़खड़ाया जब कोई पत्ता धड़क उठता था दिल

लहलहा उट्ठें शजर वो शाम की ठंडी हवा

छूट वो महताब की बढ़ जाए पानी खेत का

उड़ रहे हैं इस तरह मौज-ए-हवा के साथ में

जान गोया पड़ गई है ख़ाक के ज़र्रात में

डूबता सूरज वो चढ़ती धूप वो दिलकश समाँ

सुर्ख़ी-ए-मशरिक़ से वो उठता हुआ शब का धुआँ

बेल हर-सू इश्क़-ए-पेचाँ की वो लहराई हुई

आसमाँ की तरह चक्कर में ज़मीं आई हुई

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
About the poet

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

उपनाम : 'क़ैसर' मूल नाम : सयय्द महमूद हसन जन्म : 19 Aug 1919 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Aug 2011 | दिल्ली, भारत

View profile & all 7 Poems / Stories

More from सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

  1. इश्क़ के मुख़्बिर को अपना राज़-दाँ समझा था मैं

    इश्क़ के मुख़्बिर को अपना राज़-दाँ समझा था मैंरहज़न-ए-मंज़िल को मीर-ए-कारवाँ समझा था में

    12.4K reads
  2. शब-ए-फ़ुर्क़त तुम्हारी याद रह रह कर रुलाती है

    शब-ए-फ़ुर्क़त तुम्हारी याद रह रह कर रुलाती हैन है दिल को सुकूँ इक दम न नींद आँखों में आती है

    12.4K reads
  3. मिरी निगाह को पैहम ये जुस्तुजू क्या है

    मिरी निगाह को पैहम ये जुस्तुजू क्या हैये मावरा-ए-हिजाबात-ए-रंग-ओ-बू क्या है

    12.4K reads
  4. ऐसे में तिरी याद आती है - नज़्म

    जब चाँदनी खुलती है हर-सू हर ज़र्रा ताबाँ होता हैजब छूट से माह-ओ-अंजुम की दरिया में चराग़ाँ होता है

    12.4K reads
  5. शायद कि बहार आई - नज़्म

    आह-ए-दिल-ए-मुज़्तर की तासीर नज़र आईक्या ख़्वाब-ए-मोहब्बत की ता'बीर नज़र आई

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीइश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिएइश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिएआप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए— मुनव्वर रानाअर्थात् एक ज़रूरी काममहाकाव्यों महानायकों के दिन हवा हुएआज दिन भर बस मैं एक कुतिया का पीछा करूँगा— हेमंत शेषआग की रेत पर तैरती नदीउस लड़की के सिर परसदैव तारों से जड़ा— भूपिंदर प्रीतप्रेम के दस्तावेज़ों मेंप्रेम के दस्तावेज़ों में बाक़ी हैअभी लिखी जानी दास्ताँ उन लोगों की— धर्मेश