About Muktibodh
Gajanan Madhav Muktibodh (13 November 1917 – 11 September 1964)[1] was one of the most prominent Hindi poets, essayist, literary and political critic, and fiction writers of the 20th century.[2] He also remained assistant-editor of journals like, Naya Khun and Vasudha.[2] He is widely considered one of the pioneers of…
Selected Quotes
Poetry & Stories
घोर धनुर्धर,
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगातेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा
चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन
मुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँ
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-सा
>दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांग
दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांगस्वप्न के भीतर स्वप्न,
नाश देवता
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
About Muktibodh
Muktibodh: Quick Answers
Who is Muktibodh?
Gajanan Madhav Muktibodh (13 November 1917 – 11 September 1964)[1] was one of the most prominent Hindi poets, essayist, literary and political critic, and fiction writers of the 20th century. [2] He also remained assistant-editor of journals like, Naya Khun and Vasudha.
When was Muktibodh born?
Muktibodh was born on 13 November 1917. Associated place: Chambal division.
Where can I read Muktibodh's poetry?
Kavishala has 34 poems and stories by Muktibodh, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Muktibodh
घोर धनुर्धर,
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगातेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा
चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन
मुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँ
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-सा
>दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांग
दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांगस्वप्न के भीतर स्वप्न,
नाश देवता
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
लौट नहीं आते
खगदल हैं ऐसे भी कि न जोआते हैं, लौट नहीं आते
पता नहीं
पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिलेकिस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!
पूंजीवादी समाज के प्रति
इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धिइतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
ब्रह्मराक्षस
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़परित्यक्त सूनी बावड़ी
बहुत दिनों से
मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों सेबहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना
बेचैन चील
बेचैन चील!!उस जैसा मैं पर्यटनशील
भूल-ग़लती
भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर
Selected Quotes by Muktibodh (चुनिंदा उद्धरण)
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़परित्यक्त सूनी बावड़ीइतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धिइतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धिमुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँदिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांगस्वप्न के भीतर स्वप्न,पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिलेकिस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकरVideos on Muktibodh
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