About Mujtaba Hussain
Mujtaba Hussain (15 July 1936 – 27 May 2020) was an Indian satirist and writer of Urdu literature.
Selected Quotes
Poetry & Stories
दीमकों की मलिका से एक मुलाक़ात
एक ज़माना था जब मेरा ज़्यादा तर वक़्त लाइब्रेरियों में गुज़रता था। लेकिन जब मैं ने देखा कि समाज में जोह्ला तरक़्क़ी करते चले जा रहे हैं और ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर क़ब्ज़ा जमा चुके हैं तो मैंने सोचा कि ला'नत है ऐसे इ'ल्म पर जिससे इ'ल्म की प्यास तो भले ही बुझ जाए लेकिन पेट की आग न बुझने पाए। मुल्क की यूनीवर्सिटी पर ग़ुस्सा भी आया कि अगर वो इ'ल्म को फैलाने के बजाए जिहालत को ही आ'म करने का बेड़ा उठा लेतीं तो आज मुल्क न जाने कितनी तरक़्क़ी कर लेता। इस ख़याल के आते ही मैंने लाइब्रेरियों को ख़ैराबाद कहा और फिर कभी उनकी तरफ़ आँख उठा कर भी न देखा। मैंने बाहर आकर जिहालत के गुर सीखने की कोशिश की। यहाँ तक कि सियासतदानों की सोहबतों से फ़ैज़याब हुआ कि ये हस्तियाँ जिहालत का सरचश्मा होती हैं। लेकिन ये गुर न आया। किसी ने सच कहा है कि इ'ल्म की दौलत आदमी के पास एक बार आ जाती है तो फिर कभी नहीं जाती। मैंने लाख कोशिश की कि अपने अंदर जो इ'ल्म का इफ़लास है उसे किसी तरह बाहर निकालूं और इसकी जगह जिहालत की दौलत से अपने सारे वजूद को मालामाल कर दूँ मगर ये काम न हो सका। ये और बात है कि एक अ'र्सा तक इ'ल्म से लगातार और मुसलसल दूर रहने की वजह से मैंने थोड़ी बहुत तरक़्क़ी कर ली है।मगर पिछले दिनों बात कुछ यूँ हुई कि मैं अपने एक दोस्त के साथ कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे अचानक एक ज़रूरी काम याद आ गया। उसने कहा कि वो दो घंटों में वापिस आ जाएगा। तब तक मैं यहीं उसका इंतिज़ार करूं। सामने एक पार्क था। सोचा कि यहाँ वक़्त गुज़ार लूँ लेकिन इस उम्र में नौजवानों की ख़ुशगवार मस्रूफ़ियतों और ना-ख़ुशगवार हरकतों में मोखिल होना पसंद न आया। सामने एक होटल था जहाँ निहायत ऊंची आवाज़ में मौसीक़ी को बजा कर ग्राहकों को होटल के अंदर आने से रोका जा रहा था। अब वो पुरानी लाइब्रेरी ही बराबर में रह गई थी जिसमें मैं अपने ज़माना-ए-जाहिलियत में निहायत पाबंदी से जाया करता था। ख़याल आया कि चलो आज लाइब्रेरी में चलकर देखते हैं कि किस हाल में हैं यारान-ए-वतन।
तकिया कलाम
तकिया कलाम से यहाँ हमारी मुराद वो तकिया कलाम नहीं है जो बातचीत के दौरान में बार-बार मदाख़िलत जा-व-बेजा करता है बल्कि यहाँ तकिया कलाम से मुराद वो कलाम है जो तकियों पर ज़ेवर-ए-तबा से आरास्ता होता है और जिस पर आप अपना सर रख कर सो जाते हैं और जो आप की नीदें हलाल करता है। परसों की बात है कि हमने एक महफ़िल में ग़ालिब का शे'र पढ़ा,नींद उसकी है दिमाग़ उसका है रातें उसकी हैं
स्विस बैंक में खाता हमारा
हज़रात! मैं किसी मजबूरी और दबाव के बगै़र और पूरे होश-व-हवास के साथ ये ए'लान करना चाहता हूँ कि स्विट्ज़रलैण्ड के एक बैंक में मेरा एकाउंट मौजूद है। आप इस बात को नहीं मानते तो न मानिए। मेरी बीवी भी पहले इस बात को नहीं मानती थी। अब न सिर्फ़ इस बात को मान रही है बल्कि मुझे भी मानने लगी है। आप यक़ीनन ये सोच रहे होंगे कि जब सारे लोग अपने खातों को पोशीदा रखने के सौ-सौ जतन कर रहे हैं तो ऐसे में मुझे अपने आप ही अपने खाते की मौजूदगी का ए'लान करने की ज़रूरत क्यों पेश आ रही है। एक दिन मैं दफ़्तर से बेहद थका मांदा घर पहुंचा तो बीवी ने कहा, आप जो इतना थक जाते हैं तो इस का मतलब ये है कि आप दफ़्तर में काम भी करते हैं।मैंने कहा, भला ये भी कोई पूछने की बात है। आदमी काम करने से ही तो थकता है। यही वजह है कि आज तक मैंने किसी सियास्तदान और मौलवी को थका मांदा नहीं पाया।
मुशायरे और मुजरे का फ़र्क़
दिल्ली के एक हफ़तावार रिसाले ने उर्दू मुशायरों के ज़वाल पर मुख़्तलिफ़ शायरों और दानिशवरों के बयानात को शाए करने का सिलसिला शुरू किया है। उसके ताज़ा शुमारे में उर्दू के बुज़ुर्ग शायर हज़रत ख़ुमार बाराबंकवी का एक बयान शाया हुआ है जिसमें उन्होंने मुशायरे के ज़वाल के दीगर अस्बाब पर रौशनी डालते हुए आज के दौर की शायरात के बारे में भी इज़हार-ए-ख़याल किया है। उनका कहना है कि आज की शायरात ने मुशायरे को मुजरा बना दिया है। पहले मैं मुशायरे में जाता था तो उम्र बढ़ती थी। मगर अब मुशायरों में जाने से उम्र घटने लगी है।हज़रत ख़ुमार बाराबंकवी माशा-अल्लाह अब अस्सी (80) के पेटे में हैं और पिछले साठ बरसों से मुल्क के मुशायरों में हिस्सा ले रहे हैं। ये कहा जाए तो बेजा न होगा कि जितने मुशायरे उन्होंने पढ़े हैं, उतनी तो किताबें भी हमने न पढ़ी होंगी। अपनी उम्र, तजुर्बा और इ'ल्म के ऐ'तबार से उनका शुमार हमारे बुज़ुर्गों में होता है और वो हमारे पसंदीदा शायरों में से हैं। लेकिन कभी-कभी हालात ऐसे पैदा हो जाते हैं कि बुज़ुर्गों से इख़्तिलाफ़ करना ज़रूरी हो जाता है। सर ज़फ़रुल्लाह ख़ान ने एक बार पतरस बुख़ारी से पूछा, बताइए के तंबूरे और तानपुरे में क्या फ़र्क़ होता है? इस पर पतरस बुख़ारी ने सर ज़फ़रुल्लाह ख़ाँ से पूछा, हुज़ूर! ये बताइए कि अब आपकी उम्र क्या है? सर ज़फ़रुल्लाह ख़ाँ बोले, पचहत्तर (75) बरस का हो चुका हूँ। ये सुनकर पतरस बुख़ारी ने निहायत इत्मिनान से कहा, हुज़ूर! जब आपने अपनी ज़िंदगी के पचहत्तर बरस तंबूरे और तानपुरे का फ़र्क़ जाने बगै़र गुज़ार दिए तो पाँच दस बरस और सब्र कर लीजिए। ऐसी भी क्या जल्दी है। ख़ुमार बाराबंकवी ने अब जो ये कहा है कि मौजूदा दौर की शायरात ने मुशायरे और मुजरे के फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया है और ये कि मुशायरों में शिरकत करने से अब उनकी उम्र घटने लगी है तो इस सिलसिले में हमारी दस्त-बस्ता अ'र्ज़ ये है कि वो ऐसी ग़ैर ज़रूरी बातों पर ग़ौर करके अपनी उम्र को मज़ीद घटने न दें। ये क्या ज़रूरी है कि वो अपनी उम्र को बढ़ाने की आस में मुशायरों में शिरकत करते रहें। माना कि ख़ुमार बाराबंकवी हमारे बुज़ुर्ग हैं लेकिन हम उनके इस बयान से इत्तिफ़ाक़ नहीं करते कि आजकी शायरात ने मुशायरे और मुजरे के फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया है क्योंकि हमारा ख़याल है कि मुशायरे और मुजरे में अब भी एक वाज़ेह फ़र्क़ मौजूद है।वो इस तरह कि मुजरे में तवाइफ़ें इस तरह बन-संवर कर और सज-धज कर पेश नहीं होतीं जैसी हमारी ख़ातून शाएरा मुशायरों में जलवागर होती हैं।
ग़ज़ल सपलाइंग एंड मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी (प्रा. अनलिमटेड)
इधर जब से दुनिया तिजारत के चंगुल में फंस गई है। उस वक़्त से हर शय तराज़ू में तुलने और तिजारत के सांचे में ढलने लगी है। हमें उस नौजवान की बात अब भी याद है जिसने एक कुतुब-फ़रोश की दुकान पर खड़े हो कर कुतुब-फ़रोश से कहा था, जनाब-ए-वाला! मुझे कृष्ण चन्द्र के दो किलो अफ़साने, राजिंदर सिंह बेदी के डेढ़ किलो कहानियाँ और फ़ैज़ की चार किलो ग़ज़लें दीजिए।इस पर कुतुब-फ़रोश ने हमारी आँखों के सामने कृष्ण चन्द्र और बेदी की कहानियों के मजमूए तराज़ू में तौल कर दिए और फ़ैज़ की ग़ज़लों के बारे में फ़रमाया, हुज़ूर-ए-वाला! मैं आपको फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें देने के मुक़िफ़ में नहीं हूँ क्योंकि फ़ैज़ का सारा अदबी सरमाया दो किलो ग़ज़लों पर मुश्तमिल है। यक़ीन न आए तो दस्त-ए-सबा , नक़्श-ए-फ़र्यादी और ज़िन्दां नामा को तौल कर देख लीजिए।
About Mujtaba Hussain
Mujtaba Hussain: Quick Answers
Who is Mujtaba Hussain?
Mujtaba Hussain (15 July 1936 – 27 May 2020) was an Indian satirist and writer of Urdu literature.
When was Mujtaba Hussain born?
Mujtaba Hussain was born on 15 July 1936. Associated place: Hyderabad, Hyderabad State, British Raj.
When did Mujtaba Hussain die?
Mujtaba Hussain passed away on 27 May 2020.
Where can I read Mujtaba Hussain's poetry?
Kavishala has 5 poems and stories by Mujtaba Hussain, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Mujtaba Hussain
दीमकों की मलिका से एक मुलाक़ात
एक ज़माना था जब मेरा ज़्यादा तर वक़्त लाइब्रेरियों में गुज़रता था। लेकिन जब मैं ने देखा कि समाज में जोह्ला तरक़्क़ी करते चले जा रहे हैं और ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर क़ब्ज़ा जमा चुके हैं तो मैंने सोचा कि ला'नत है ऐसे इ'ल्म पर जिससे इ'ल्म की प्यास तो भले ही बुझ जाए लेकिन पेट की आग न बुझने पाए। मुल्क की यूनीवर्सिटी पर ग़ुस्सा भी आया कि अगर वो इ'ल्म को फैलाने के बजाए जिहालत को ही आ'म करने का बेड़ा उठा लेतीं तो आज मुल्क न जाने कितनी तरक़्क़ी कर लेता। इस ख़याल के आते ही मैंने लाइब्रेरियों को ख़ैराबाद कहा और फिर कभी उनकी तरफ़ आँख उठा कर भी न देखा। मैंने बाहर आकर जिहालत के गुर सीखने की कोशिश की। यहाँ तक कि सियासतदानों की सोहबतों से फ़ैज़याब हुआ कि ये हस्तियाँ जिहालत का सरचश्मा होती हैं। लेकिन ये गुर न आया। किसी ने सच कहा है कि इ'ल्म की दौलत आदमी के पास एक बार आ जाती है तो फिर कभी नहीं जाती। मैंने लाख कोशिश की कि अपने अंदर जो इ'ल्म का इफ़लास है उसे किसी तरह बाहर निकालूं और इसकी जगह जिहालत की दौलत से अपने सारे वजूद को मालामाल कर दूँ मगर ये काम न हो सका। ये और बात है कि एक अ'र्सा तक इ'ल्म से लगातार और मुसलसल दूर रहने की वजह से मैंने थोड़ी बहुत तरक़्क़ी कर ली है।मगर पिछले दिनों बात कुछ यूँ हुई कि मैं अपने एक दोस्त के साथ कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे अचानक एक ज़रूरी काम याद आ गया। उसने कहा कि वो दो घंटों में वापिस आ जाएगा। तब तक मैं यहीं उसका इंतिज़ार करूं। सामने एक पार्क था। सोचा कि यहाँ वक़्त गुज़ार लूँ लेकिन इस उम्र में नौजवानों की ख़ुशगवार मस्रूफ़ियतों और ना-ख़ुशगवार हरकतों में मोखिल होना पसंद न आया। सामने एक होटल था जहाँ निहायत ऊंची आवाज़ में मौसीक़ी को बजा कर ग्राहकों को होटल के अंदर आने से रोका जा रहा था। अब वो पुरानी लाइब्रेरी ही बराबर में रह गई थी जिसमें मैं अपने ज़माना-ए-जाहिलियत में निहायत पाबंदी से जाया करता था। ख़याल आया कि चलो आज लाइब्रेरी में चलकर देखते हैं कि किस हाल में हैं यारान-ए-वतन।
तकिया कलाम
तकिया कलाम से यहाँ हमारी मुराद वो तकिया कलाम नहीं है जो बातचीत के दौरान में बार-बार मदाख़िलत जा-व-बेजा करता है बल्कि यहाँ तकिया कलाम से मुराद वो कलाम है जो तकियों पर ज़ेवर-ए-तबा से आरास्ता होता है और जिस पर आप अपना सर रख कर सो जाते हैं और जो आप की नीदें हलाल करता है। परसों की बात है कि हमने एक महफ़िल में ग़ालिब का शे'र पढ़ा,नींद उसकी है दिमाग़ उसका है रातें उसकी हैं
स्विस बैंक में खाता हमारा
हज़रात! मैं किसी मजबूरी और दबाव के बगै़र और पूरे होश-व-हवास के साथ ये ए'लान करना चाहता हूँ कि स्विट्ज़रलैण्ड के एक बैंक में मेरा एकाउंट मौजूद है। आप इस बात को नहीं मानते तो न मानिए। मेरी बीवी भी पहले इस बात को नहीं मानती थी। अब न सिर्फ़ इस बात को मान रही है बल्कि मुझे भी मानने लगी है। आप यक़ीनन ये सोच रहे होंगे कि जब सारे लोग अपने खातों को पोशीदा रखने के सौ-सौ जतन कर रहे हैं तो ऐसे में मुझे अपने आप ही अपने खाते की मौजूदगी का ए'लान करने की ज़रूरत क्यों पेश आ रही है। एक दिन मैं दफ़्तर से बेहद थका मांदा घर पहुंचा तो बीवी ने कहा, आप जो इतना थक जाते हैं तो इस का मतलब ये है कि आप दफ़्तर में काम भी करते हैं।मैंने कहा, भला ये भी कोई पूछने की बात है। आदमी काम करने से ही तो थकता है। यही वजह है कि आज तक मैंने किसी सियास्तदान और मौलवी को थका मांदा नहीं पाया।
मुशायरे और मुजरे का फ़र्क़
दिल्ली के एक हफ़तावार रिसाले ने उर्दू मुशायरों के ज़वाल पर मुख़्तलिफ़ शायरों और दानिशवरों के बयानात को शाए करने का सिलसिला शुरू किया है। उसके ताज़ा शुमारे में उर्दू के बुज़ुर्ग शायर हज़रत ख़ुमार बाराबंकवी का एक बयान शाया हुआ है जिसमें उन्होंने मुशायरे के ज़वाल के दीगर अस्बाब पर रौशनी डालते हुए आज के दौर की शायरात के बारे में भी इज़हार-ए-ख़याल किया है। उनका कहना है कि आज की शायरात ने मुशायरे को मुजरा बना दिया है। पहले मैं मुशायरे में जाता था तो उम्र बढ़ती थी। मगर अब मुशायरों में जाने से उम्र घटने लगी है।हज़रत ख़ुमार बाराबंकवी माशा-अल्लाह अब अस्सी (80) के पेटे में हैं और पिछले साठ बरसों से मुल्क के मुशायरों में हिस्सा ले रहे हैं। ये कहा जाए तो बेजा न होगा कि जितने मुशायरे उन्होंने पढ़े हैं, उतनी तो किताबें भी हमने न पढ़ी होंगी। अपनी उम्र, तजुर्बा और इ'ल्म के ऐ'तबार से उनका शुमार हमारे बुज़ुर्गों में होता है और वो हमारे पसंदीदा शायरों में से हैं। लेकिन कभी-कभी हालात ऐसे पैदा हो जाते हैं कि बुज़ुर्गों से इख़्तिलाफ़ करना ज़रूरी हो जाता है। सर ज़फ़रुल्लाह ख़ान ने एक बार पतरस बुख़ारी से पूछा, बताइए के तंबूरे और तानपुरे में क्या फ़र्क़ होता है? इस पर पतरस बुख़ारी ने सर ज़फ़रुल्लाह ख़ाँ से पूछा, हुज़ूर! ये बताइए कि अब आपकी उम्र क्या है? सर ज़फ़रुल्लाह ख़ाँ बोले, पचहत्तर (75) बरस का हो चुका हूँ। ये सुनकर पतरस बुख़ारी ने निहायत इत्मिनान से कहा, हुज़ूर! जब आपने अपनी ज़िंदगी के पचहत्तर बरस तंबूरे और तानपुरे का फ़र्क़ जाने बगै़र गुज़ार दिए तो पाँच दस बरस और सब्र कर लीजिए। ऐसी भी क्या जल्दी है। ख़ुमार बाराबंकवी ने अब जो ये कहा है कि मौजूदा दौर की शायरात ने मुशायरे और मुजरे के फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया है और ये कि मुशायरों में शिरकत करने से अब उनकी उम्र घटने लगी है तो इस सिलसिले में हमारी दस्त-बस्ता अ'र्ज़ ये है कि वो ऐसी ग़ैर ज़रूरी बातों पर ग़ौर करके अपनी उम्र को मज़ीद घटने न दें। ये क्या ज़रूरी है कि वो अपनी उम्र को बढ़ाने की आस में मुशायरों में शिरकत करते रहें। माना कि ख़ुमार बाराबंकवी हमारे बुज़ुर्ग हैं लेकिन हम उनके इस बयान से इत्तिफ़ाक़ नहीं करते कि आजकी शायरात ने मुशायरे और मुजरे के फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया है क्योंकि हमारा ख़याल है कि मुशायरे और मुजरे में अब भी एक वाज़ेह फ़र्क़ मौजूद है।वो इस तरह कि मुजरे में तवाइफ़ें इस तरह बन-संवर कर और सज-धज कर पेश नहीं होतीं जैसी हमारी ख़ातून शाएरा मुशायरों में जलवागर होती हैं।
ग़ज़ल सपलाइंग एंड मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी (प्रा. अनलिमटेड)
इधर जब से दुनिया तिजारत के चंगुल में फंस गई है। उस वक़्त से हर शय तराज़ू में तुलने और तिजारत के सांचे में ढलने लगी है। हमें उस नौजवान की बात अब भी याद है जिसने एक कुतुब-फ़रोश की दुकान पर खड़े हो कर कुतुब-फ़रोश से कहा था, जनाब-ए-वाला! मुझे कृष्ण चन्द्र के दो किलो अफ़साने, राजिंदर सिंह बेदी के डेढ़ किलो कहानियाँ और फ़ैज़ की चार किलो ग़ज़लें दीजिए।इस पर कुतुब-फ़रोश ने हमारी आँखों के सामने कृष्ण चन्द्र और बेदी की कहानियों के मजमूए तराज़ू में तौल कर दिए और फ़ैज़ की ग़ज़लों के बारे में फ़रमाया, हुज़ूर-ए-वाला! मैं आपको फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें देने के मुक़िफ़ में नहीं हूँ क्योंकि फ़ैज़ का सारा अदबी सरमाया दो किलो ग़ज़लों पर मुश्तमिल है। यक़ीन न आए तो दस्त-ए-सबा , नक़्श-ए-फ़र्यादी और ज़िन्दां नामा को तौल कर देख लीजिए।
Selected Quotes by Mujtaba Hussain (चुनिंदा उद्धरण)
उस तकिया ने हम में वो सारे आसार पैदा करदिए जो आग़ाज़-ए-इश्क़ के लिए ज़रूरी समझे जाते हैं।बहरा आदमी भी उसके कलाम को आसानी से समझ सकता है।तुम जिस समाज में रहते हो वहाँ आराम, सुकून और शांति का दूर-दूर तक कहीं कोई पता नहीं है।पड़ोसियों के बारे में आप जानते हैं कि ये सिर्फ़ आप की ख़ुशियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और अगर आप की ज़िंदगी में दुख न हों तो उन्हें पैदा करने की कोशिश भी करते हैं।इधर जब से दुनिया तिजारत के चंगुल में फंस गई है।Videos on Mujtaba Hussain
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