शब-ए-फ़ुर्क़त तुम्हारी याद रह रह कर रुलाती है
न है दिल को सुकूँ इक दम न नींद आँखों में आती है
क़रीब-ए-कू-ए-जानाँ आ गया क्या क़ाफ़िला दिल का
कि हर हर ज़र्रे से बू-ए-मोहब्बत मुझ को आती है
ख़याल-ए-वस्ल से भी किस तरह तस्कीन हो दिल को
कि फिर मिल कर जुदा होने की साअ'त याद आती है
मोहब्बत क्या इसी का नाम है दुनिया में ऐ 'क़ैसर'
कि शम-ए-बज़्म परवाने को जल जल कर जलाती है








