शब-ए-फ़ुर्क़त तुम्हारी याद रह रह कर रुलाती है

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोहीसयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही19 Aug 1919 – 3 Aug 2011

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शब-ए-फ़ुर्क़त तुम्हारी याद रह रह कर रुलाती है

न है दिल को सुकूँ इक दम न नींद आँखों में आती है

क़रीब-ए-कू-ए-जानाँ आ गया क्या क़ाफ़िला दिल का

कि हर हर ज़र्रे से बू-ए-मोहब्बत मुझ को आती है

ख़याल-ए-वस्ल से भी किस तरह तस्कीन हो दिल को

कि फिर मिल कर जुदा होने की साअ'त याद आती है

मोहब्बत क्या इसी का नाम है दुनिया में ऐ 'क़ैसर'

कि शम-ए-बज़्म परवाने को जल जल कर जलाती है

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
About the poet

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

उपनाम : 'क़ैसर' मूल नाम : सयय्द महमूद हसन जन्म : 19 Aug 1919 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Aug 2011 | दिल्ली, भारत

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