ऐसे में तिरी याद आती है - नज़्म

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोहीसयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही19 Aug 1919 – 3 Aug 2011

1 min read · 12.4K reads

जब चाँदनी खुलती है हर-सू हर ज़र्रा ताबाँ होता है

जब छूट से माह-ओ-अंजुम की दरिया में चराग़ाँ होता है

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

जब सूरज झुकने लगता है और चाँद सितारे खुलते हैं

दिन रात बहम जब होते हैं जब दोनों नज़ारे मिलते हैं

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

अंजुम के सुहाने साए में जब रात की देवी सोती है

जब सब्ज़ा दामन भरता है और शबनम माया खोती है

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

हर ज़र्रा मौज-ए-फ़ज़ा में जब फ़ितरत के राज़ उगलता है

लब बंद कली के साँचे में जब फूल का पैकर ढलता है

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

जब देख के मयख़ाने का समाँ रिंदों की नज़र इतराती है

जब दौर में साग़र होता है जब रक़्स में मीना आती है

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

मजबूर-ए-मोहब्बत की दुनिया जब आस के बल पर जीती है

उम्मीद की इक मासूम झलक जब चाक-ए-गरेबाँ सीती है

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

सावन की वो मतवाली रातें और रातों की तन्हाई तौबा

जब काली घटाएँ उठती हैं लेती हुई अंगड़ाई तौबा

ऐसे में तिरी याद आती है

याद आने वाले ये तो बता क्या मैं भी तुझे याद आता हूँ

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
About the poet

सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही

उपनाम : 'क़ैसर' मूल नाम : सयय्द महमूद हसन जन्म : 19 Aug 1919 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Aug 2011 | दिल्ली, भारत

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