About Anuj Lugun
Anuj Lugun (born 10 January 1986) is a Jharkhandi Indian poet and writer.[citation needed] His poetry espoused indigenous renaissance and intense rebellion against fascism and oppression. Lugun's activism for political and social justice earned him the title of Tribal Poet. Work and service Lugun is working as Assista…
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Poetry & Stories
About Anuj Lugun
Work and service Lugun is working as Assistant Professor in School of Indian Language at Central University of South Bihar (CUB). Currently pursuing research in Mundari songs at Banaras Hindu University. After serving in the Ministry of Human Resource Development (India), Lugun established himself as a Poet in Jharkhand. Lugun's writings explore themes such as love, freedom, and revolution; he opposed all bigotry, including religious and gender. Throughout his career, Lugun wrote short stories, novels, and essays but is best known for his poems.
Awards and recognition
Yuva Puraskar 2019 for his long Hindi poem Baghaur Sugna Munda ki Beti (The Tiger and the Daughter of Sugna Munda)
Anuj Lugun- won the prestigious Bharat Bhushan Agarwal Award in 2011 for the best poem in Hindi
Rashtriya Muktibodh Puraskara (Madhya Pradesh Sahitya Akademi) 2009
Anuj Lugun: Quick Answers
Who is Anuj Lugun?
Anuj Lugun (born 10 January 1986) is a Jharkhandi Indian poet and writer. [citation needed] His poetry espoused indigenous renaissance and intense rebellion against fascism and oppression.
When was Anuj Lugun born?
Anuj Lugun was born on 10 January 1986.
Where can I read Anuj Lugun's poetry?
Kavishala has 20 poems and stories by Anuj Lugun, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Anuj Lugun
मेरे कमरे में पुराना अख़बार
मेरे कमरे में पुराना अख़बारहवा के झोंके से फड़फड़ा रहा है
अघोषित उलगुलान
अघोषित उलगुलान[1]अल सुबह दान्डू का काफ़िला
अनायास ही लिख देता हूँ
अनायास ही लिख देता हूँतुम्हारा नाम
ऑक्सीजन के बिना
ऑक्सीजन के बिनासब कुछ थमने लगता है
अभी-अभी पहुँच रहे हैं
अभी-अभी पहुँच रहे हैंहमारे नेतागण
वे जो सुविधाभोगी हैं
वे जो सुविधाभोगी हैंया मौक़ा परस्त हैं
शहीद विलियम लुगुन को याद करते हुए
(शहीद विलियम लुगुन को याद करते हुएबहुत नम हैं पेड़ों की पत्तियाँ
वे उतनी ही लड़ाकू थीं
वे उतनी ही लड़ाकू थींजितना की उनका सेनापति
जिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुए
जिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुएजिन्हें छाँव होना था वे बंजर हुए
एकलव्य की कथा सुनकर मैं हमेशा इस उधेड़बुन
एकलव्य की कथा सुनकर मैं हमेशा इस उधेड़बुन में रहा हूँ कि द्रोण को अपना अँगूठा दान करने के बाद उसकी तीरंदाजी कहाँ गई ? क्या वह उसी तरह का तीरंदाज बना रहा या उसने तीरंदाजी ही छोड़ दी ? उसकी परंपरा का विकास आगे कहीं होता है या नहीं ? इसके आगे की कथा का जिक्र मैंने कहीं नहीं सुना। लेकिन अब जब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ तो महसूस करता हूँ कि रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती। हो सकता है एकलव्य ने अपना अँगूठा दान करने के बाद तर्जनी और मध्यमिका अँगुलियों के सहारे तीरंदाजी का अभ्यास किया हो। क्योंकि मुझे ऐसा ही प्रमाण उड़ीसा के सीमावर्ती झारखंड के सिमडेगा जिले के मुंडा आदिवासियों में दिखाई देता है। इस संबंध में मैं स्वयं प्रमाण हूँ। (हो सकता है ऐसा हुनर अन्य क्षेत्र के आदिवासियों के पास भी हो) यहाँ के मुंडा आदिवासी अँगूठे का प्रयोग किए बिना तर्जनी और मध्यमिका अँगुली के बीच तीर को कमान में फँसाकर तीरंदाजी करते हैं। रही बात इनके निशाने की तो इस पर सवाल उठाना मूर्खता होगी। तीर से जंगली जानवरों के शिकार की कथा आम है। मेरे परदादा , पिताजी , भैया यहाँ तक कि मैंने भी इसी तरीके से तीरंदाजी की है। मेरे लिए यह एकलव्य की खोज है और यह कविता इस तरह एकलव्य से एक संवाद।1.
एकलव्य से संवाद 1
एकलव्य से संवाद-एकलव्य की कथा सुनकर मैं हमेशा इस उधेड़बुन में रहा हूं कि द्रोण को अपना अँगूठा दान करने के बाद उसकी तीरंदाजी कहाँ गई? क्या वह उसी तरह का तीरंदाज बना रहा या उसने तीरंदाजी ही छोड़ दी? उसकी परंपरा का विकास आगे कहीं होता है या नहीं? इसके आगे की कथा का ज़िक्र मैंने कहीं नहीं सुना। लेकिन अब जब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ तो महसूस करता हूं कि रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती। हो सकता है एकलव्य ने अपना अँगूठा दान करने के बाद तर्जनी और मध्यमिका अँगुलियों के सहारे तीरंदाजी का अभ्यास किया हो। क्योंकि मुझे ऐसा ही प्रमाण उड़ीसा के सीमावर्ती झारखंड के सिमडेगा जिले के मुंडा आदिवासियों में दिखाई देता है। इस संबंध में मैं स्वयं प्रमाण हूँ। (हो सकता है ऐसा हुनर अन्य क्षेत्र के आदिवासियों के पास भी हो) यहाँ के मुंडा आदिवासी अँगूठे का प्रयोग किए बिना तर्जनी और मध्यमिका अँगुली के बीच तीर को कमान में फँसाकर तीरंदाज़ी करते हैं। रही बात इनके निशाने की तो इस पर सवाल उठाना मूर्खता होगी। तीर से जंगली जानवरों के शिकार की कथा आम है। मेरे परदादा, पिताजी, भैया यहाँ तक कि मैंने भी इसी तरीके से तीरंदाज़ी की है। मेरे लिए यह एकलव्य की खोज है और यह कविता इस तरह एकलव्य से एक संवाद।
एकलव्य से संवाद-2
एकलव्य से संवाद-2हवा के हल्के झोकों से
Selected Quotes by Anuj Lugun (चुनिंदा उद्धरण)
अघोषित उलगुलान[1]अल सुबह दान्डू का काफ़िला(शहीद विलियम लुगुन को याद करते हुएबहुत नम हैं पेड़ों की पत्तियाँसेंदेरा कोड़ा कोआ कपि जिलिब जिलिबा - मुंडारी लुक गीत (शिकारी युवकों के फरसे चमकते हैं , वे सुंदर लगते हैं।अनायास ही लिख देता हूँतुम्हारा नामअभी-अभी पहुँच रहे हैंहमारे नेतागणजिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुएजिन्हें छाँव होना था वे बंजर हुएVideos on Anuj Lugun
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