About Ibn e Insha
Sher Muhammad Khan (Urdu: شیر مُحمّد خان), better known by his pen name Ibn-e-Insha, (Urdu: اِبنِ اِنشا ) (15 June 1927 – 11 January 1978)] was a Pakistani Urdu poet, humorist, travelogue writer and newspaper columnist. Along with his poetry, he was regarded as one of the best humorists of Urdu. His poetry has a dis…
Selected Quotes
Poetry & Stories
इंशाजी उठो अब कूच करो
इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥
उस शाम वो रुख़सत
उस शाम वो रुख़सत का समाँ याद रहेगावो शहर, वो कूचा, वो मकाँ याद रहेगा
एक छोटा-सा लड़का था
एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनोंएक मेले में पंहुचा हुमकता हुआ
रेख़्ता
(एक)लोग हिलाले-शाम से बढ़कर पल में माहे-तमाम हुए
कवित्त
(एक)जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
About Ibn e Insha
Ibn e Insha: Quick Answers
Who is Ibn e Insha?
Sher Muhammad Khan (Urdu: شیر مُحمّد خان), better known by his pen name Ibn-e-Insha, (Urdu: اِبنِ اِنشا ) (15 June 1927 – 11 January 1978)] was a Pakistani Urdu poet, humorist, travelogue writer and newspaper columnist. Along with his poetry, he was regarded as one of the best humorists of Urdu.
When was Ibn e Insha born?
Ibn e Insha was born on 15 June 1927.
When did Ibn e Insha die?
Ibn e Insha passed away on 11 January 1978.
Where can I read Ibn e Insha's poetry?
Kavishala has 11 poems and stories by Ibn e Insha, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Ibn e Insha
इंशाजी उठो अब कूच करो
इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥
उस शाम वो रुख़सत
उस शाम वो रुख़सत का समाँ याद रहेगावो शहर, वो कूचा, वो मकाँ याद रहेगा
एक छोटा-सा लड़का था
एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनोंएक मेले में पंहुचा हुमकता हुआ
रेख़्ता
(एक)लोग हिलाले-शाम से बढ़कर पल में माहे-तमाम हुए
कवित्त
(एक)जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा
फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने होंफ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों
इक बार कहो तुम मेरी हो
हम घूम चुके बस्ती-बन मेंइक आस का फाँस लिए मन में
साए से
क्यों मेरे साथ-साथ आता है ?मेरी मंज़िल है बेनिशाँ नादाँ
इंतजार की रात
उमड़ते आते हैं शाम के सायेदम-ब-दम बढ़ रही है तारीकी
सावन-भादों
सावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहाँअपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी-सी बरसात कहाँ
हम उनसे अगर मिल बैठते हैं
हम उनसे अगर मिल बैठते हैं क्या दोष हमारा होता हैकुछ अपनी जसारत होती है कुछ उनका इशारा होता है
Selected Quotes by Ibn e Insha (चुनिंदा उद्धरण)
एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनोंएक मेले में पंहुचा हुमकता हुआफ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने होंफ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने होंहम घूम चुके बस्ती-बन मेंइक आस का फाँस लिए मन मेंउस शाम वो रुख़सत का समाँ याद रहेगावो शहर, वो कूचा, वो मकाँ याद रहेगासावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहाँअपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी-सी बरसात कहाँइंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥Videos on Ibn e Insha
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