About Malik Muhammad Jayasi
Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his date and place of birth are a matter of debate. As the nisba "…
Selected Quotes
Poetry & Stories
आखरी कलाम 1
पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥
आखरी कलाम 2
धूत एक मारत गनि गुना । कपट-रूप नारद करि चुना ॥`नावँ न साधु', साधि कहवावै तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥
आखिरी कलाम 3
पुनि फरमाए आपु गोसाईं । तुमहि दैउ जिवाइहि नाहीं ॥सुनि आयसु पाछे कहँ ढाए । तिसरी पौरि नाँघि नहिं पाए ॥
आखिरी कलाम 4
सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
आखिरी कलाम 5
पुनि रसूल तलफत तहँ जैहैं । बीबिहि बार बार समुझैहैं ॥बीबी कहब, `घाम कत सहहू ? कस ना बैठि छाहँ महँ रहहू ? ॥
About Malik Muhammad Jayasi
Malik Muhammad Jayasi: Quick Answers
Who is Malik Muhammad Jayasi?
Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script.
When was Malik Muhammad Jayasi born?
Malik Muhammad Jayasi was born on 1 January 1477.
Where can I read Malik Muhammad Jayasi's poetry?
Kavishala has 23 poems and stories by Malik Muhammad Jayasi, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Malik Muhammad Jayasi
आखरी कलाम 1
पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥
आखरी कलाम 2
धूत एक मारत गनि गुना । कपट-रूप नारद करि चुना ॥`नावँ न साधु', साधि कहवावै तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥
आखिरी कलाम 3
पुनि फरमाए आपु गोसाईं । तुमहि दैउ जिवाइहि नाहीं ॥सुनि आयसु पाछे कहँ ढाए । तिसरी पौरि नाँघि नहिं पाए ॥
आखिरी कलाम 4
सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
आखिरी कलाम 5
पुनि रसूल तलफत तहँ जैहैं । बीबिहि बार बार समुझैहैं ॥बीबी कहब, `घाम कत सहहू ? कस ना बैठि छाहँ महँ रहहू ? ॥
आखिरी कलाम 6
सुनि फरमान हरष जिउ बाढे । एक पाँव से भए उठि ढाढे ॥झारि उमत लागी तब तारी । जेता सिरजा पुरुष औ नारी ॥
पद्मावत स्तुति-खंड
सुमिरौं आदि एक करतारू । जेहि जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू ॥कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू । कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू ॥
पद्मावत सिंहलद्वीप -वर्णन खंड
सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदमिनी बरनि सुनावौं ॥निरमल दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥
पद्मावत जन्म-खंड
चंपावति जो रूप सँवारी । पदमावति चाहै औतारी ॥भै चाहै असि कथा सलोनी । मेटि न जाइ लिखी जस होनी ॥
पद्मावत मानसरोदक-खंड
एक दिवस पून्यो तिथि आई । मानसरोदक चली नहाई ॥पदमावति सब सखी बुलाई । जनु फुलवारि सबै चलि आई ॥
पद्मावत सुआ-खंड
पदमावति तहँ खेल दुलारी । सुआ मँदिर महँ देखि मजारी ॥कहेसि चलौं जौ लहि तन पाँखा । जिउ लै उडा ताकि बन ढाँखा ॥
पद्मावत रत्नसेन-जन्म-खंड
चित्रसेन चितउर गढ राजा । कै गढ कोट चित्र सम साजा ॥तेहि कुल रतनसेन उजियारा । धनि जननी जनमा अस बारा ॥
Selected Quotes by Malik Muhammad Jayasi (चुनिंदा उद्धरण)
एक दिवस पून्यो तिथि आई । मानसरोदक चली नहाई ॥पदमावति सब सखी बुलाई । जनु फुलवारि सबै चलि आई ॥सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदमिनी बरनि सुनावौं ॥निरमल दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥सुमिरौं आदि एक करतारू । जेहि जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू ॥कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू । कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू ॥सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥चंपावति जो रूप सँवारी । पदमावति चाहै औतारी ॥भै चाहै असि कथा सलोनी । मेटि न जाइ लिखी जस होनी ॥Videos on Malik Muhammad Jayasi
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