About Trilochan
कवि त्रिलोचन (20-08-1917 - 09-12-2007) हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि थे . उन्हें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। वे आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभों में से एक थे। त्रिलोचन शास्त्री हिंदी के अतिरिक्त अरबी और फारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता…
Selected Quotes
Poetry & Stories
यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने
यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गाँठ लगा दी !
विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,
विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,ग्वैड़े आया, और हाथ दोनों हैं ख़ाली;
सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई
सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
अधिभूत
अधिभूतमदन के शर केवल पाँच हैं
दिन ये फूल के हैं
दिन ये फूल के हैंमत जाना चले कहीं भूल के
About Trilochan
त्रिलोचन शास्त्री हिंदी के अतिरिक्त अरबी और फारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे खासे सक्रिय रहे है। उन्होंने प्रभाकर, वानर, हंस, आज, समाज जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया।
त्रिलोचन शास्त्री 1995 से 2001 तक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वाराणसी के ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था में भी काम करते रहे और हिंदी व उर्दू के कई शब्दकोषों की योजना से भी जुडे़ रहे। उन्हें हिंदी सॉनेट का साधक माना जाता है। उन्होंने इस छंद को भारतीय परिवेश में ढाला और लगभग 550 सॉनेट की रचना की।[4] इसके अतिरिक्त कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से भी उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनका पहला कविता संग्रह धरती 1945 में प्रकाशित हुआ था। गुलाब और बुलबुल, उस जनपद का कवि हूं और ताप के ताए हुये दिन उनके चर्चित कविता संग्रह थे। दिगंत और धरती जैसी रचनाओं को कलमबद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री के 17 कविता संग्रह प्रकाशित हुए।
पुरस्कार व सम्मान
त्रिलोचन शास्त्री को 1989-90 में हिंदी अकादमी ने शलाका सम्मान से सम्मानित किया था। हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हे 'शास्त्री' और 'साहित्य रत्न' जैसे उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। 1982 में ताप के ताए हुए दिन के लिए उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था।[8] इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी समिति पुरस्कार, हिंदी संस्थान सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शलाका सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार, सुलभ साहित्य अकादमी सम्मान, भारतीय भाषा परिषद सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया था।
प्रकाशित कृतियाँ
कविता संग्रह-
धरती(1945),
गुलाब और बुलबुल(1956),
दिगंत(1957),
ताप के ताए हुए दिन(1980),
शब्द(1980),
उस जनपद का कवि हूँ (1981)
अरधान (1984),
तुम्हें सौंपता हूँ(1985),
मेरा घर,
चैती,
अनकहनी भी कुछ कहनी है,
जीने की कला(2004)
संपादित-
मुक्तिबोध की कविताएँ
कहानी संग्रह-
देशकाल
डायरी-
दैनंदिनी
Trilochan: Quick Answers
Who is Trilochan?
कवि त्रिलोचन (20-08-1917 - 09-12-2007) हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि थे . उन्हें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है।
When was Trilochan born?
Trilochan was born on 20 August 1917.
When did Trilochan die?
Trilochan passed away on 9 December 2007.
Where can I read Trilochan's poetry?
Kavishala has 24 poems and stories by Trilochan, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Trilochan
यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने
यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गाँठ लगा दी !
विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,
विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,ग्वैड़े आया, और हाथ दोनों हैं ख़ाली;
सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई
सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
अधिभूत
अधिभूतमदन के शर केवल पाँच हैं
दिन ये फूल के हैं
दिन ये फूल के हैंमत जाना चले कहीं भूल के
आकांक्षा
सुरीली सारंगी अतुल रस-धारा उगल केकहीं खोई जो थी, बढ़ कर उठाया लहर में,
इलाहाबादी
काफ़े,रेस्त्राँ में हिलमिल कर बैठे । बातेंकीं; कुछ व्यंग्य-विनोद और कुछ नए टहोके
कठिन यात्रा
कभी सोचा मैं ने, सिर पर बड़े भार धर के,सधे पैरों यात्रा सबल पद से भी कठिन है,
कला के अभ्यासी
कहेंगे जो वक्ता बन कर भले वे विकल हों,कला के अभ्यासी क्षिति तल निवासी जगत के
कातिक पयान करने को है, उठाया है
कातिक पयान करने को है, उठाया हैदाहिना चरण, देहरी को लाँघ आया है,
जो है सो है
खिले फूलों से ही खिंच कर रमे जो भुवन मेंअभावों की छाया पकड़ कर भावांत उन का
टूटा ह्रदय
कहीं से टूटा भी हृदय अपना नित्य अपनारहेगा । भूले भी पथ पर इसे छोड़ कर जो
Selected Quotes by Trilochan (चुनिंदा उद्धरण)
विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,ग्वैड़े आया, और हाथ दोनों हैं ख़ाली;यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गाँठ लगा दी !कभी सोचा मैं ने, सिर पर बड़े भार धर के,सधे पैरों यात्रा सबल पद से भी कठिन है,कहीं से टूटा भी हृदय अपना नित्य अपनारहेगा । भूले भी पथ पर इसे छोड़ कर जोकातिक पयान करने को है, उठाया हैदाहिना चरण, देहरी को लाँघ आया है,दिन ये फूल के हैंमत जाना चले कहीं भूल केVideos on Trilochan
Loading videos…
Books by Trilochan
Loading books…








