About Dharamvir Bharati
Dharamvir Bharati was a renowned Hindi poet, author, playwright and a social thinker of India. He was the chief editor of the popular Hindi weekly magazine Dharmayug, from 1960 till 1987. Bharati was awarded the Padma Shree for literature in 1972 by the Government of India. His novel Gunaho Ka Devta became a classic.
Selected Quotes
Poetry & Stories
दोपहर नवम्बर की
अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती हैजार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !
आँगन
बरसों के बाद उसी सूने- आँगन मेंजाकर चुपचाप खड़े होना
मर गई कविता
लादकर ये आज किसका शव चले?और इस छतनार बरगद के तले,
टूटा हुआ पहिया
मैंरथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
एक वाक्य
चेक बुक हो पीली या लाल,दाम सिक्के हों या शोहरत -
About Dharamvir Bharati
Dharamvir Bharati: Quick Answers
Who is Dharamvir Bharati?
Dharamvir Bharati was a renowned Hindi poet, author, playwright and a social thinker of India. He was the chief editor of the popular Hindi weekly magazine Dharmayug, from 1960 till 1987.
When was Dharamvir Bharati born?
Dharamvir Bharati was born on 25 December 1926. Associated place: Allahabad.
Where can I read Dharamvir Bharati's poetry?
Kavishala has 26 poems and stories by Dharamvir Bharati, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by Dharamvir Bharati
दोपहर नवम्बर की
अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती हैजार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !
आँगन
बरसों के बाद उसी सूने- आँगन मेंजाकर चुपचाप खड़े होना
मर गई कविता
लादकर ये आज किसका शव चले?और इस छतनार बरगद के तले,
टूटा हुआ पहिया
मैंरथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
एक वाक्य
चेक बुक हो पीली या लाल,दाम सिक्के हों या शोहरत -
उपलब्धि
उपलब्धिमैं क्या जिया ?
उत्तर नहीं हूँ
उत्तर नहीं हूँमैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?
ये शामें, सब की सब शामें...जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
सुभाष की मृत्यु पर
दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचेसोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
विदा देती एक दुबली बाँह
विदा देती एक दुबली बाँह सी यह मेड़अंधेरे में छूटते चुपचाप बूढ़े पेड़
शाम
एक:शाम है, मैं उदास हूँ शायद
तुम्हारे चरण
ये शरद के चाँद-से उजले धुले-से पाँव,मेरी गोद में !
Selected Quotes by Dharamvir Bharati (चुनिंदा उद्धरण)
लादकर ये आज किसका शव चले?और इस छतनार बरगद के तले,दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचेसोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या परअपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती हैजार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !ये शरद के चाँद-से उजले धुले-से पाँव,मेरी गोद में !उत्तर नहीं हूँमैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!बरसों के बाद उसी सूने- आँगन मेंजाकर चुपचाप खड़े होनाVideos on Dharamvir Bharati
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