दर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशी

प्रताप सोमवंशीप्रताप सोमवंशी20 Sept 1968

6 min read · 12.5K reads

पसोपेश में हूँ
कि कविता चिह्नों में होती है
या प्रतीकों में
बिम्बों में होती है
होती है मिथकों में
या फिर कुछ तारीखों में

पसोपेश में हूँ
कि कविता आवेग में होती है
या विचार में
कहीं दर्शन की गुत्थियों में होती है
कविता
या किसी के तरंगी व्यवहार में

पसोपेश में हूँ
कि कविता
कहीं जंगल की अंधेरी और रहस्यमय
कंदराओं में होती है
या किसी पेड़ की टहनी पर खिले एक
फूल में
कविता छिपी है किसी तलहटी की
सलवटों
 या किसी तालाब की तलछट में
 या विराजती है
हिमशिखर पर उग आए किरीट-शूल में


पसोपेश में हूँ
कि कविता संशिलष्ट चेहरों के
पीछे है
या चेहरों पर फ़ैली है नकाब बनकर
कविता अक्स है अन्दर की किसी
भंवर का
या खड़ी है ठोस सतह पर
हिजाब बनकर

पसोपेश में हूँ
कि कविता आग में होती है
या आग की लपट में
होती है कविता माँ की दूधिया रगों में
या मौके-बे-मौके की डाँट-डपट में

पसोपेश में हूँ
कि कविता सौंदर्य-शास्त्र है
या सौन्दर्य के पिरामिड पर बैठी
शातिर बाघिन
या
फिर एक मासूम गिलहरी
प्रताप सोमवंशी
About the poet

प्रताप सोमवंशी

#PratapSomvanshi अपने भीतर है जो इंसान बचाकर रखना अपनी मिट्टी की ये पहचान बचाकर रखना परिचय. जन्म : 2 नवंबर 1968.

View profile & all 38 Poems / Stories