About नजमा शाहीन खोसा
LCCN : n2013205355
Selected Quotes
Poetry & Stories
मोहब्बतों का सिला नहीं है
मोहब्बतों का सिला नहीं हैलबों पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं है
इब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द है
इब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द हैइश्क़ का दर्द तो ला-दवा दर्द है
अजनबी शहर की अजनबी शाम में
अजनबी शहर की अजनबी शाम मेंज़िंदगी ढल गई मल्गजी शाम में
चाँदनी चुप रही रौशनी चुप रही
चाँदनी चुप रही रौशनी चुप रहीमेरी हर बात पर ज़िंदगी चुप रही
इश्क़ को आँख में जलते देखा
इश्क़ को आँख में जलते देखाफूल को आग में खिलते देखा
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नजमा शाहीन खोसा: Quick Answers
Who is नजमा शाहीन खोसा?
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Kavishala has 49 poems and stories and 2 couplets (sher) by नजमा शाहीन खोसा, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by नजमा शाहीन खोसा
मोहब्बतों का सिला नहीं है
मोहब्बतों का सिला नहीं हैलबों पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं है
इब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द है
इब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द हैइश्क़ का दर्द तो ला-दवा दर्द है
अजनबी शहर की अजनबी शाम में
अजनबी शहर की अजनबी शाम मेंज़िंदगी ढल गई मल्गजी शाम में
चाँदनी चुप रही रौशनी चुप रही
चाँदनी चुप रही रौशनी चुप रहीमेरी हर बात पर ज़िंदगी चुप रही
इश्क़ को आँख में जलते देखा
इश्क़ को आँख में जलते देखाफूल को आग में खिलते देखा
ज़ख़्मों से कहाँ लफ़्ज़ों से मारी गई हूँ मैं
ज़ख़्मों से कहाँ लफ़्ज़ों से मारी गई हूँ मैंजीवन के चाक से यूँ उतारी गई हूँ मैं
उस की तलब में राह को तकती है ज़िंदगी
उस की तलब में राह को तकती है ज़िंदगीआँखों में वक़्त-ए-शाम चमकती है ज़िंदगी
ज़हमत कभी कभी तो मशक़्क़त कभी कभी
ज़हमत कभी कभी तो मशक़्क़त कभी कभीलगती है ज़िंदगी भी मुसीबत कभी कभी
मुझे जब भी वो गलियाँ और वो रस्ता याद आता है
मुझे जब भी वो गलियाँ और वो रस्ता याद आता हैकोई धुँदला सा मंज़र है जो उजला याद आता है
कैसे कहें कि कैसे गुज़ारी है ज़िंदगी
कैसे कहें कि कैसे गुज़ारी है ज़िंदगीक्या बोझ थी कि सर से उतारी है ज़िंदगी
ज़िंदगी बे-क़रार लगती है
ज़िंदगी बे-क़रार लगती हैदर्द की आबशार लगती है
हिज्र में भी ये मिरी साँस अगर बाक़ी है
हिज्र में भी ये मिरी साँस अगर बाक़ी हैइस का मतलब है मोहब्बत में असर बाक़ी है
Selected Quotes by नजमा शाहीन खोसा (चुनिंदा उद्धरण)
दर्द की लहर में ज़िंदगी बह गई उम्र यूँ कट गई हिज्र की शाम मेंआख़िरी बार आया था मिलने कोई हिज्र मुझ को मिला वस्ल की शाम मेंज़हमत कभी कभी तो मशक़्क़त कभी कभीलगती है ज़िंदगी भी मुसीबत कभी कभीमुझे जब भी वो गलियाँ और वो रस्ता याद आता हैकोई धुँदला सा मंज़र है जो उजला याद आता हैअजनबी शहर की अजनबी शाम मेंज़िंदगी ढल गई मल्गजी शाम मेंइब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द हैइश्क़ का दर्द तो ला-दवा दर्द हैCouplets (Sher) by नजमा शाहीन खोसा
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