हिज्र में भी ये मिरी साँस अगर बाक़ी है

नजमा शाहीन खोसानजमा शाहीन खोसा

1 min read · 12.4K reads

हिज्र में भी ये मिरी साँस अगर बाक़ी है

इस का मतलब है मोहब्बत में असर बाक़ी है

छोड़ ये बात मिले ज़ख़्म कहाँ से तुझ को

ज़िंदगी इतना बता कितना सफ़र बाक़ी है

तुम सितमगर हो न घबराओ मिरी हालत पर

ज़ख़्म सहने का अभी मुझ में हुनर बाक़ी है

हिज्र की आग में जलने से नहीं डरती मैं

इश्क़ मुझ में अभी बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बाक़ी है

मेरे तिनके भी हुए राख तो क्या हर्ज भला

आतिश-ए-इश्क़ बता कितना ये घर बाक़ी है

साँस लेना ही तो 'शाहीन' नहीं है जीवन

ढूँड कर लाओ मिरी रूह अगर बाक़ी है

नजमा शाहीन खोसा
About the poet

नजमा शाहीन खोसा

LCCN : n2013205355

View profile & all 49 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

मुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानातुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैतुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है— मुनव्वर रानाक्या ऐसी स्त्री को जानते हैंहम प्रेम नहीं करतेयानी हमारी भावनाएँ आत्मघाती नहीं हैं— हरे प्रकाश उपाध्यायअर्थात् एक ज़रूरी काममहाकाव्यों महानायकों के दिन हवा हुएआज दिन भर बस मैं एक कुतिया का पीछा करूँगा— हेमंत शेषआग की रेत पर तैरती नदीउस लड़की के सिर परसदैव तारों से जड़ा— भूपिंदर प्रीतप्रेम के दस्तावेज़ों मेंप्रेम के दस्तावेज़ों में बाक़ी हैअभी लिखी जानी दास्ताँ उन लोगों की— धर्मेश