इब्तिदा दर्द है इंतिहा दर्द है
इश्क़ का दर्द तो ला-दवा दर्द है
मैं ने पूछा वफ़ा का सिला जो कभी
उस ने हँस कर ये मुझ से कहा दर्द है
प्यार से इश्क़ तक जा-ब-जा रौशनी
प्यार से इश्क़ तक जा-ब-जा दर्द है
ये नया फूल है और ये ख़ुश्बू नई
ये नई शाम है और नया दर्द है
ज़ख़्म कैसा है भरता नहीं है कभी
दर्द होता नहीं है ये क्या दर्द है
मैं तो डरने लगी उस की ता'बीर से
प्यार आँखों में जब से बना दर्द है
एक पल में कहाँ खो गई है ख़ुशी
अब तो उल्फ़त की बस इक सज़ा दर्द है
छोड़ 'शाहीं' वफ़ा का तू अब तज़्किरा
बेवफ़ा है ख़ुशी बा-वफ़ा दर्द है








