चाँदनी चुप रही रौशनी चुप रही
मेरी हर बात पर ज़िंदगी चुप रही
हम तो घुट घुट के इक रोज़ मर जाएँगे
इस घुटन में अगर आँख भी चुप रही
दर्द मेरा बयाँ उन से कब हो सका
शे'र ख़ामोश थे शाइ'री चुप रही
इक यक़ीं था पलट आएगा वो अभी
मैं तो बस उस की रह देखती चुप रही
मुझ को मक़्तल में जिस रोज़ भेजा गया
सोचती हूँ मैं क्यूँ उस घड़ी चुप रही
मैं ने 'शाहीन' जीवन गुज़ारा है यूँ
नींद में बात की जागती चुप रही








