आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

1 min read · 12.4K reads

आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ

या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ

यक-क़तरा ख़ूँ बग़ल में है दिल मिरी सो उस को

पलकों से तेरी ख़ातिर क्यूँ-कर निचोड़ डालूँ

वो आहू-ए-रमीदा मिल जाए तीरा-शब गर

कुत्ता बनूँ शिकारी उस को भंभोड़ डालूँ

ख़य्यात ने क़ज़ा के जामा सिया जो मेरा

आया न जी में इतना क्या इस में जोड़ डालूँ

वो संग-दिल हुआ है इक संग-दिल पे आशिक़

आता है जी में सर को पथरों से फोड़ डालूँ

बैठा हूँ ख़ाली आख़िर ऐ आँसुओ करूँ क्या

दो चार गोखरो ही लाओ न मोड़ डालूँ

तक़्सीर 'मुसहफ़ी' की होवे मुआफ़ साहिब

फ़रमाओ तो तुम्हारे ला उस को गोड़ डालूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

View profile & all 51 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like