रात पर्दे से ज़रा मुँह जो किसू का निकला

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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रात पर्दे से ज़रा मुँह जो किसू का निकला

शोला समझा था उसे मैं प भभूका निकला

महर ओ मह उस की फबन देख के हैरान रहे

जब वरक़ यार की तस्वीर-ए-दो-रू का निकला

ये अदा देख के कितनों का हुआ काम तमाम

नीमचा कल जो टुक उस अरबदा-जू का निकला

मर गई सर्व पे जब हो के तसद्दुक़ क़ुमरी

उस से उस दम भी न तौक़ अपने गुलू का निकला

'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म

तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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