लोग कहते हैं मोहब्बत में असर होता है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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लोग कहते हैं मोहब्बत में असर होता है

कौन से शहर में होता है किधर होता है

उस के कूचे में है नित सूरत-ए-बेदाद नई

क़त्ल हर ख़स्ता बा-अंदाज़-ए-दिगर होता है

नहीं मालूम कि मातम है फ़लक पर किस का

रोज़ क्यूँ चाक गिरेबान-ए-सहर होता है

वूहीं अपनी भी है बारीक-तर-अज़-मू गर्दन

तेग़ के साथ यहाँ ज़िक्र-ए-कमर होता है

कर के मैं याद दिल अपने को बहुत रोता हूँ

जब किसी शख़्स का दुनिया से सफ़र होता है

उस की मिज़्गाँ का कोई नाम न लो क्या हासिल

मेरा इन बातों से सुराख़ जिगर होता है

'मुसहफ़ी' हम तो तिरे मिलने को आए कई बार

ऐ दिवाने तू किसी वक़्त भी घर होता है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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