समय की गवाही

धीरेंद्र 'धवल'धीरेंद्र 'धवल'18 May 1990

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एक नीलगाय

निकल आई थी नोएडा के हाईवे पर

वहाँ की मिट्टी में उसके जंगल की गंध थी

सियारों का झुंड

दाख़िल हो गया था क़स्बे में

वहाँ उनके गाँव के ऊसर की गंध थी

प्यासे जानवरों ने

घेर ली थी एक घर की चहारदीवारी

वह उनके तालाब की माटी थी

गाँव के एक प्राइवेट स्कूल की दीवाल पर

जगह-जगह उग आए थे पीपल

दीवालें चटक गई थीं

पीपल जानते थे

इसी जगह पर घना बग़ीचा था

राष्ट्र नदी कराह रही है

देहात की भी नदियाँ बिलख रही हैं

उनमें न पानी है और न ही जान

जिस मिट्टी में अँखुआते थे अनाज

उस मिट्टी की बंद हो चुकी है साँस

डॉलर और नोट की हवस में

जो उजाड़ रहे हैं

जंगल और उर्वर खेत

नदी, तालाब, बग़ीचा

वह सोख रहे हैं साँसें

अपनी पीढ़ियों की

उनकी पीढियाँ बचेंगी तो समझेंगी

भूमंडलीकरण का दौर

नरभक्षी पीढ़ियों का था

उन लोगों का भी

जिन्हें पेड़ की साँसें

अपने बच्चों की साँसें लगतीं

धीरेंद्र 'धवल'
About the poet

धीरेंद्र 'धवल'

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : धीरेंद्र 'धवल' जन्म : 18/05/1990 | मऊ, उत्तर प्रदेश

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