अनाज की सुदृश्य वर्णमाला

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

1 min read · 12.4K reads

जोत-कोड़ कर मुझमें छीट दो अनाज के बीज

आँसू से पटाऊँगा पथरीली ज़मीन

हाड़-माँस को खाद फल-फूल उठेंगे धान उड़द सरसों—

अनाज की सुदृश्य वर्णमाला

तिल कुश तुलसी शुद्ध कर लो मुझे

विह्वल मुख दो सृजन-प्रकृति की भाषा

धान-बाढ़ से सुदृढ़ आवेग-अस्तित्व निर्जन निर्माण

मेरे हृदय के नीचे हवा-धूप की अदृश्य जड़।

हीरेन भट्टाचार्य
About the poet

हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

View profile & all 15 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like