जोत-कोड़ कर मुझमें छीट दो अनाज के बीज
आँसू से पटाऊँगा पथरीली ज़मीन
हाड़-माँस को खाद फल-फूल उठेंगे धान उड़द सरसों—
अनाज की सुदृश्य वर्णमाला
तिल कुश तुलसी शुद्ध कर लो मुझे
विह्वल मुख दो सृजन-प्रकृति की भाषा
धान-बाढ़ से सुदृढ़ आवेग-अस्तित्व निर्जन निर्माण
मेरे हृदय के नीचे हवा-धूप की अदृश्य जड़।








