देखना

धीरेंद्र 'धवल'धीरेंद्र 'धवल'18 May 1990

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उस तरह मत देखना किसी को

जिस तरह

नदी को देखता है व्यापारी

हरे जंगलों को देखते हैं विकास के नायक

उनकी तरह भी नहीं

जिनकी निगाह में स्त्री केवल देह है

नदी जानती है

व्यापारी देखता है नदी का पानी

नदी की मछलियाँ, नदी की ज़मीन

हरे जंगल जानते हैं

विकास के नायक

पेड़ों को रौंदकर

खड़ा कर देंगे कंक्रीट का जंगल

स्त्रियाँ जानती हैं

स्त्री को देह की नज़र से देखने वाले

कामुक और कुंठित ही नहीं कॉर्पोरेट भी होते हैं

कॉर्पोरेट स्त्री को बाज़ार की नज़र से देखता है

जिसकी नज़र में स्त्री विज्ञापन की वस्तु है

उसी तरह जैसे कामुकों और कुंठितों की नज़र में

स्त्री भोग-विलास की वस्तु

नदी चाहती है

जो आँखें उसकी ओर उठें

वे देख पाए तो देखें

उसका बहाव और सौंदर्य

अतिक्रमण और अवहेलना

और उसकी ठंडी पड़ी धार

स्त्री चाहती है,

उसे देखना ही है तो देखा जाए

उसके हिम्मत और जुनून को

उसके श्रम

उसके सौंदर्य को

वह चाहती है, उसकी आँखों में देखा जाए

जिसमें उसकी राग के हर रंग दर्ज हैं

धीरेंद्र 'धवल'
About the poet

धीरेंद्र 'धवल'

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : धीरेंद्र 'धवल' जन्म : 18/05/1990 | मऊ, उत्तर प्रदेश

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