पृथ्वी की ओर से

धीरेंद्र 'धवल'धीरेंद्र 'धवल'18 May 1990

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यक्ष ने पूछा था युधिष्ठिर से

पृथ्वी से बड़ी क्या

युधिष्ठिर ने जवाब दिया था माँ

माँ कोई एक स्थूल रूप नहीं

यह भाव है जीवनदाता के प्रति कृतज्ञता का

उपयोगितावादी संस्कृति के विस्तार में

माँ सिमट गई है

मातृ दिवस की औपचारिकताओं में

उसी तरह जैसे पृथ्वी दिवस

पृथ्वी को माँ बताने वाले

सरकारी पोस्टरों के चमकते चेहरे

तुम्हारी माँ कराह रही है

इस धरा पर

उसके बच्चे और बच्चियाँ

नदियाँ, पहाड़ और झरने

बिलख रहे हैं अपने होने पर

जिनसे मिलता है

तुम्हें और तुम्हारे मतदाताओं को जीवन

वह उजाड़े जा रहे हैं निर्ममता से

मतदान करने वाले मतदाताओं

हरी-भरी पृथ्वी

मतदान का मुद्दा बने न बने

अपने और अपनी पीढ़ियों को

देखना है यदि स्वस्थ और सुघर

बचाना होगा गाँव के बग़ीचों को

पोखरों में बचाना होगा पानी

रोकना होगा नदियों को सूखने से

कैसे देखा जा सकता है

माँ के मन पर खरोंचचों को

उदास पृथ्वी उदास माँ ही होती है

धीरेंद्र 'धवल'
About the poet

धीरेंद्र 'धवल'

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : धीरेंद्र 'धवल' जन्म : 18/05/1990 | मऊ, उत्तर प्रदेश

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