गिलहरियों की जगह

हरि मृदुलहरि मृदुल

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पेड़ों की जगह धीरे-धीरे बहुमंज़िली इमारतों ने ले ली

तो बेचारी गिलहरियों ने भी कुछ समय तक

इन्हें ही अपना आसरा मान लिया

लेकिन जब कांक्रीट के जंगल फैलते चले गए

तो गिलहरियाँ इन भूलभुलैयों में भटकती हुईं

एक-एक कर जान देती गईं

अब हालात ये हैं कि परिसर में

एक भी गिलहरी नहीं दिखाई दे रही

मोटे-तगड़े चूहे ज़रूर निर्द्वंद्व विचर रहे हैं

कौतुक की बात यह भी है कि

जैसे पेड़ों की जगह

इमारतों ने ले ली

और गिलहरियों की जगह चूहों ने

आदमी की जगह हूबहू आदमी जैसे

दिखने वाले शख़्स ने ली है

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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