हम कैसे जान पाते
बगुलों का युगल-गान
एकांत में घोलता है अगाध प्रेम
हम कैसे जान पाते
पूरी प्रक्रिया
पतझड़
वसंत
बरसात
भटकना
और फ़रवरी
अप्रैल हर साल पूरे बीते साल का संधि-बिंदु होता है
हम
यात्रा में
हठयोग में
इस तरह
रहते हैं निरंतर
मिलन तक
कोकिल तत्सम में मूक
तद्भव में मीठी तान गा रही है
तीसरे पहर के आखिरी आलाप में!








