रात, चाँद और गिटार

उत्कर्षउत्कर्ष1 Sept 1995

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तब तक

गमले में रातरानी लौट चुकी थी

चंद्रमा पूरा गोल होने से ज़रा-सा कम था

पूरी छत

सन्नाटे में गुँथी हुई थी

और शहर में जितनी रोशनी थी

चाँद के उजाले से ज़्यादा फैला दी गई थी

झींगुर नहीं थे

सन्नाटे के होने की दुविधा में भी

कोई रात की कश्तियाँ बना

अतीत की बरसात के जल में तैरा रहा था

और कोई था

जो हल्के गिटार के नोट्स बजाते

ह्विटमैन गुनगुना रहा था

ये एक ब्लूज़ वाली रात थी

जिसके कोरों में ओपेरा का धागा बँधा हुआ था

सन्नाटे को चीरता

शनैः शनैः

जोड़ता आज से आज को

कल के लिए।

उत्कर्ष
About the poet

उत्कर्ष

नई पीढ़ी के कवि। गद्य-लेखन और फ़ोटोग्राफ़ी में भी सक्रिय। मूल नाम : उत्कर्ष जन्म : 01/09/1995 | पटना, बिहार

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