ऐसे समय में जब सब खोज रहे हैं अपना पता—कहीं बाहर—किसी भीड़ में।
तुम मुझे खोजना किसी भीड़ से अलग—नदी किनारे।
मैं घाट पर निहारता हूँ उस दीवार को जिस पर कभी किसी ने कोई ग्राफिटी बनाई थी… कोई पेंटिंग।
तुम मुझे शहर के आईने में मत खोजना।
शोर से बाहर आ जाना थोड़ा।
वहाँ आ जाना, जहाँ शहर ख़त्म होता है आजकल। वही किसी मलबे में होगा पुराना शहर जिसकी जड़ें टटोलता मिल जाऊँगा या खोजते वह सब जो अब कोई पुरानी ग़ज़ल है। मिलूँगा शहर की मरम्मत का सामान तलाशती किसी विरासत की शरण में।
तुम मुझे किसी भीड़ में मत खोजना।
मैं तुम्हें वहाँ नहीं मिलूँगा ।
मैं तो कभी वहाँ था ही नहीं और कभी था भी तो
यह मेरी सबसे बड़ी विवशता रही होगी।








