संसार का समग्र आत्मकथ्य

उत्कर्षउत्कर्ष1 Sept 1995

2 min read · 12.4K reads

अनंत ब्रह्मांड में यह पृथ्वी

बुनाई का शायद महज़

एक नीला धागा भर है

वस्तुतः अशेष कपड़े में एक टाँका

कोई एक सहस्राब्दी करवट लेती है

और खिलौने की चाभी

एक बार और घुमा दी जाती है

वही रक्त का लाल

वही वैभव की लालसा

वही आडंबर

और वही पलायन।

जोगी कहे कि

सब वही सब लिखकर

मिटा दे रहे हैं

स्लेट पर खींच लकीर

जोड़-गुना-घटा रहे हैं

स्लेट तो एक ही वही है।

इति।

प्रकृति अबूझ विचार है

इसे धरती से ऊपर रहकर

नहीं समझा जा सकता

जमीन पर थोड़ी देर बैठो।

इति।

जैसे प्रकृति को

वैसे कलाकार को

सब कुछ सपाट दिखाई देता है

रिक्त

जहाँ भरा जाना हो

बारंबार जीवन।

इति।

कई मसीहा हुए।

कई दीवारें बनीं।

घेरा बना।

लोग उस घेरे में रहते रहे।

और बाहर बारिश और हवा

बहती रही

धाराप्रवाह।

घेरे के भीतर बसे लोग कैसे जानते

भीतर हो रही बारिश

और बाहर हो रही बारिश में क्या भेद?

इति।

कई आदमक़द मूर्तिकार

यथेष्ट की तलाश में

घूमते रहे भीतर अनंत काल तक।

कई आदमक़द विजेता

नापते रहे भूमि

और

और

बहुत

अंत तक

अचेत होने तक।

इति।

तुम चाहते हो

जीवन एक व्यंजन हो

स्वादिष्ट हो अति

खोजते रहते हो सामान

कि ये बने यथार्थ में महत्तम।

लालसा की नियति अपूर्ण रही है।

इति।

एक दिन

जैसे आई थी पूर्व सदी में

ज़ोर की आँधी आएगी

और बहा ले जाएगी अपने साथ

सारे अनुसंधान

प्रयोग

प्राक्कथन।

तुम अपने लिखे का पहला और आख़िरी हिस्सा

खो दोगे।

बीच का पन्ना बिखर जाएगा।

जैसे पहले कभी हुआ था।

इति।

धरती पर एक जगह

भाषा का संपूर्ण महात्म्य

स्मृति और वार्तालाप की परंपरा से पोषित है।

अगर कुछ जानना हो तो लोग

एक-दूसरे से पूछ सब जान लेते हैं।

एक बड़ी जगह है

यहाँ सब चुप रहते हैं

भूल चुके हैं भाषा

स्थित मूर्तभाव

दीवारों से मूक प्रश्न करते हैं।

लोगों ने इतनी रोशनी बना ली

कि सूरज का सत्य ढँक दिया गया।

जैसे चंद्रमा की शीतल ओजस्वी उज्ज्वल ओस

सतही कृत्रिम प्रकाश में सनी वासना में

प्रवेश न कर सकी।

इति।

वह कहता है,

पहले भी…

शायद प्रथम स्मृति और बीच से अभी तक।

तुम्हारे आसमान के पार भी आसमान है

जैसे और भी बहुत कुछ

नदी

पहाड़

वन

सभी साबुत।

और?

तुमने बंद खिड़की नहीं खोली।

और खोल भी ली तो

समक्ष कई और हैं

जैसे मानव-कर्म केवल खिड़कियाँ खोलने

और उन्हें बंद और अधखुला रखने का था।

निकलो उस भू-भाग से

दूर कहीं वन का एक हिस्सा शेष है

वहाँ बरगद इतनी स्मृतियों का ज्ञाता है

तुम्हें प्राप्त करनी है

जीवन-मूल की स्मृति

धरती का स्पर्श कर

बोधिसत्व नहीं

तुम्हारी तरह, साधारण।

फिर साधनारत।

जैसे बोधिसत्व।

इति।

इस पृथ्वी पर

जीवनदायी वृक्ष की जगह उग आया है

मानव-शरीर

असंख्य।

पृथ्वी का भार बढ़ गया है

और इसी तरह होगा संसार का अंत

विस्फोट से नहीं

वरन् जैसे गुब्बारे से निकलती है हवा।

इति।

संसार एक प्रयोगशाला नहीं है।

उत्कर्ष
About the poet

उत्कर्ष

नई पीढ़ी के कवि। गद्य-लेखन और फ़ोटोग्राफ़ी में भी सक्रिय। मूल नाम : उत्कर्ष जन्म : 01/09/1995 | पटना, बिहार

View profile & all 10 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like