अनंत ब्रह्मांड में यह पृथ्वी
बुनाई का शायद महज़
एक नीला धागा भर है
वस्तुतः अशेष कपड़े में एक टाँका
कोई एक सहस्राब्दी करवट लेती है
और खिलौने की चाभी
एक बार और घुमा दी जाती है
वही रक्त का लाल
वही वैभव की लालसा
वही आडंबर
और वही पलायन।
जोगी कहे कि
सब वही सब लिखकर
मिटा दे रहे हैं
स्लेट पर खींच लकीर
जोड़-गुना-घटा रहे हैं
स्लेट तो एक ही वही है।
इति।
प्रकृति अबूझ विचार है
इसे धरती से ऊपर रहकर
नहीं समझा जा सकता
जमीन पर थोड़ी देर बैठो।
इति।
जैसे प्रकृति को
वैसे कलाकार को
सब कुछ सपाट दिखाई देता है
रिक्त
जहाँ भरा जाना हो
बारंबार जीवन।
इति।
कई मसीहा हुए।
कई दीवारें बनीं।
घेरा बना।
लोग उस घेरे में रहते रहे।
और बाहर बारिश और हवा
बहती रही
धाराप्रवाह।
घेरे के भीतर बसे लोग कैसे जानते
भीतर हो रही बारिश
और बाहर हो रही बारिश में क्या भेद?
इति।
कई आदमक़द मूर्तिकार
यथेष्ट की तलाश में
घूमते रहे भीतर अनंत काल तक।
कई आदमक़द विजेता
नापते रहे भूमि
और
और
बहुत
अंत तक
अचेत होने तक।
इति।
तुम चाहते हो
जीवन एक व्यंजन हो
स्वादिष्ट हो अति
खोजते रहते हो सामान
कि ये बने यथार्थ में महत्तम।
लालसा की नियति अपूर्ण रही है।
इति।
एक दिन
जैसे आई थी पूर्व सदी में
ज़ोर की आँधी आएगी
और बहा ले जाएगी अपने साथ
सारे अनुसंधान
प्रयोग
प्राक्कथन।
तुम अपने लिखे का पहला और आख़िरी हिस्सा
खो दोगे।
बीच का पन्ना बिखर जाएगा।
जैसे पहले कभी हुआ था।
इति।
धरती पर एक जगह
भाषा का संपूर्ण महात्म्य
स्मृति और वार्तालाप की परंपरा से पोषित है।
अगर कुछ जानना हो तो लोग
एक-दूसरे से पूछ सब जान लेते हैं।
एक बड़ी जगह है
यहाँ सब चुप रहते हैं
भूल चुके हैं भाषा
स्थित मूर्तभाव
दीवारों से मूक प्रश्न करते हैं।
लोगों ने इतनी रोशनी बना ली
कि सूरज का सत्य ढँक दिया गया।
जैसे चंद्रमा की शीतल ओजस्वी उज्ज्वल ओस
सतही कृत्रिम प्रकाश में सनी वासना में
प्रवेश न कर सकी।
इति।
वह कहता है,
पहले भी…
शायद प्रथम स्मृति और बीच से अभी तक।
तुम्हारे आसमान के पार भी आसमान है
जैसे और भी बहुत कुछ
नदी
पहाड़
वन
सभी साबुत।
और?
तुमने बंद खिड़की नहीं खोली।
और खोल भी ली तो
समक्ष कई और हैं
जैसे मानव-कर्म केवल खिड़कियाँ खोलने
और उन्हें बंद और अधखुला रखने का था।
निकलो उस भू-भाग से
दूर कहीं वन का एक हिस्सा शेष है
वहाँ बरगद इतनी स्मृतियों का ज्ञाता है
तुम्हें प्राप्त करनी है
जीवन-मूल की स्मृति
धरती का स्पर्श कर
बोधिसत्व नहीं
तुम्हारी तरह, साधारण।
फिर साधनारत।
जैसे बोधिसत्व।
इति।
इस पृथ्वी पर
जीवनदायी वृक्ष की जगह उग आया है
मानव-शरीर
असंख्य।
पृथ्वी का भार बढ़ गया है
और इसी तरह होगा संसार का अंत
विस्फोट से नहीं
वरन् जैसे गुब्बारे से निकलती है हवा।
इति।
संसार एक प्रयोगशाला नहीं है।








