बरसात हुई बहुत उस रोज़
जैसे बादल फट पड़ा हो
और जैसे खोल दिए गए हों पगहों से
कई मवेशी
एक साथ
भागते-पराते दिशाहीन
कई बरसातें एक साथ
और
धुल गया सब कुछ
जो घर का अपना था
पुरानी गाढ़ी पुताई
मोटी मज़बूत दीवारें
दीवारों पर अनगिनत हाथों की छाप
सभी छूट गए।
घर सबसे उदास रहा उस दिन
जब उससे उसका
भंडार-घर छीन लिया गया
सभी पुराने बर्तन
उनकी बातचीत
कौर की संपूर्ण कहानी बिसरा दी गई।
दीवारें बनीं
बँटवारे हुए
एक-एक चम्मच का हिसाब हुआ।
घर के बूढ़े रो रहे थे
मूक-स्वर में
उनका भी बँटवारा हुआ था
उनकी गर्म हथेलियों का।
वे कई नाती-पोतों में से किसी एक को ही
एक समय प्रेम कर सकते थे।
यह दुविधा
यह दुःख
कितना भारी था
इसका वर्णन करने की
शब्दों में सामर्थ्य नहीं।
घर उदास वीरान गली हो गया था
उसके निर्माण के दिनों के यार सब छूट रहे थे।
नीम का पेड़
जिसके दातुन की मिठास
अभी घर के ज़ेहन में ताज़ा है।
मेहँदी का पुराना गाछ।
सभी वर्णमालाएँ बिखर गई थीं।
दीवाली के छोटे-छोटे मिट्टी के घर
तोड़े जा चुके थे।
बच्चे बिलख रहे थे
जैसे उनका ज़रूरी हिस्सा
उनसे जबरन छीन लिया गया हो।
पुराना स्कूटर
घर से बाहर खड़ा
विषाद-गीत का एकालाप रच रहा था।
घर अकेला हो गया था
ये समझना और समझाना शायद बहुत मुश्किल है
पर अंजोरिया घर पर
अब रात को उस तरह नहीं बरसेगी
जैसे बरसों से छूटकर गिरती थी।
नए जंगले बन रहे थे
नए पर्दे, नई घड़ी, नया सब कुछ
शायद घर के लोगों ने
नया दिल भी कहीं से इंतज़ाम कर
लगा लिया था शरीर में!
घर अकेला हो गया था
कई हिस्सों में अकेला
प्रश्नों में अकेला
और जवाबों में भी।
व्याकरण से परे और एकांग में सौंदर्य के
अलंकारहीन।
गमन
शरीर से शरीर का जाना
आत्मा का आत्मा से टूटने जैसा कुछ है
अब उस घर में बिल्लियाँ चार जगह से
दूध के बर्तन जुठारेंगी।
गौरैया अब घर के कौन-से हिस्से से
बटोर पाएगी कविता।








