लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

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लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है

दिल पर जो किसी इश्क़ की तहरीर नहीं है

इस ज़ीस्त के हर मोड़ पे लड़नी है मुझे जंग

क़िर्तास ओ क़लम हैं कोई शमशीर नहीं है

मुमकिन ही नहीं था तुझे आवाज़ लगाते

है इश्क़ की रूदाद प तश्हीर नहीं है

दुनिया में वफ़ा ढूँडने निकले थे नदारद

इक बोझ है दिल पर मिरे शहतीर नहीं है

लम्हे में पलट देंगे ज़माने को तुम्हारे

है अहद-ए-हुनर जान ये तस्ख़ीर नहीं है

पैवस्त हैं इस घर से बहुत आप की यादें

गुज़रे हुए लम्हात हैं ज़ंजीर नहीं है

चुप-चाप बहुत देर से फिरते हैं गुरेज़ाँ

दुनिया में कोई आप सा दिल-गीर नहीं है

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

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