About शाइस्ता मुफ़्ती
जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध
Selected Quotes
Poetry & Stories
ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया
ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गयादुनिया के दस्तूर निराले आप से रिश्ता भूल गया
मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैं
मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैंजो न मुमकिन रहे वो ख़्वाब तो हैं
अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे
अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसेशाम ढल जाए तो रह-गीर भी घर को तरसे
एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने में
एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने मेंऔर पल नहीं लगता बिजलियाँ गिराने में
चाँदनी रात है दुआ कीजे
चाँदनी रात है दुआ कीजेएक दर रौशनी का वा कीजे
About शाइस्ता मुफ़्ती
जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध
शाइस्ता मुफ़्ती: Quick Answers
Who is शाइस्ता मुफ़्ती?
जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध
When was शाइस्ता मुफ़्ती born?
शाइस्ता मुफ़्ती was born on 21 September 1968. Associated place: पाकिस्तान.
Where can I read शाइस्ता मुफ़्ती's poetry?
Kavishala has 47 poems and stories by शाइस्ता मुफ़्ती, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by शाइस्ता मुफ़्ती
ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया
ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गयादुनिया के दस्तूर निराले आप से रिश्ता भूल गया
मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैं
मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैंजो न मुमकिन रहे वो ख़्वाब तो हैं
अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे
अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसेशाम ढल जाए तो रह-गीर भी घर को तरसे
एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने में
एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने मेंऔर पल नहीं लगता बिजलियाँ गिराने में
चाँदनी रात है दुआ कीजे
चाँदनी रात है दुआ कीजेएक दर रौशनी का वा कीजे
लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है
लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं हैदिल पर जो किसी इश्क़ की तहरीर नहीं है
शाम आ कर झरोकों में बैठी रहे
शाम आ कर झरोकों में बैठी रहेसाअतों में समुंदर पिरोती रहे
काग़ज़ी फूल खिला रक्खे हैं
काग़ज़ी फूल खिला रक्खे हैंरिश्ता-ए-दर्द निभा रक्खे हैं
न तोड़ो ज़िंदगी रिश्ता जहाँ से
न तोड़ो ज़िंदगी रिश्ता जहाँ सेमिलेगा फिर कोई साथी कहाँ से
चाँद निकला था परे बाम से पहले पहले
चाँद निकला था परे बाम से पहले पहलेउस गली भूल पड़े शाम से पहले पहले
आइना देखा तो सूरत अपनी पहचानी गई
आइना देखा तो सूरत अपनी पहचानी गईभूल ही बैठे थे ख़ुद को उम्र अर्ज़ानी गई
उन से मिलने का इरादा है क़ज़ा से पहले
उन से मिलने का इरादा है क़ज़ा से पहलेक्यूँ न दिल खोल के जी लूँ मैं सज़ा से पहले
Selected Quotes by शाइस्ता मुफ़्ती (चुनिंदा उद्धरण)
चाँदनी रात है दुआ कीजेएक दर रौशनी का वा कीजेख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गयादुनिया के दस्तूर निराले आप से रिश्ता भूल गयामेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैंजो न मुमकिन रहे वो ख़्वाब तो हैंलिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं हैदिल पर जो किसी इश्क़ की तहरीर नहीं हैन तोड़ो ज़िंदगी रिश्ता जहाँ सेमिलेगा फिर कोई साथी कहाँ सेएक उम्र लगती है आशियाँ बनाने मेंऔर पल नहीं लगता बिजलियाँ गिराने मेंVideos on शाइस्ता मुफ़्ती
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