एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने में
और पल नहीं लगता बिजलियाँ गिराने में
पूछते हो क्या मुझ से कौन सी है ये मंज़िल
तीरगी सुलगती है इक दिया जलाने में
कौन ख़्वाब देखेगा दूसरी रिफ़ाक़त के
ज़िंदगी बता दी है तुम को भूल जाने में
शब-गज़ीदा शहज़ादी सज-सँवर के आइए
जुगनूओं के गहने हैं रात के ख़ज़ाने में
मुंतज़िर थी मैं कब से इक तिरी नवाज़िश की
देर क्यों लगाते हो आँख को उठाने में
और सभी गिले शिकवे फिर कभी उठा रखना
वक़्त बीत जाएगा आप को मनाने में
हम-सफ़र मिरे हमदम रास्ता वही मंज़िल
इस क़दर तकल्लुफ़ क्यों हाल-ए-दिल सुनाने में








