चाँदनी रात है दुआ कीजे

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

1 min read · 12.4K reads

चाँदनी रात है दुआ कीजे

एक दर रौशनी का वा कीजे

हम ने माना कि बेवफ़ा है बहुत

ज़िंदगी से मगर वफ़ा कीजे

गुफ़्तुगू एक मसअला ठहरी

अब इशारों पे इक्तिफ़ा कीजे

वो समझते नहीं हमारी बात

क्या न कीजे हुज़ूर क्या कीजे

मुंतज़िर आँख ढूँढती है तुम्हें

बाम पर इक दिया धरा कीजे

फिर सुकूँ की उदास तन्हाई

फिर नए ग़म से मशवरा कीजे

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

View profile & all 47 Poems / Stories

More from शाइस्ता मुफ़्ती

  1. ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया

    ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गयादुनिया के दस्तूर निराले आप से रिश्ता भूल गया

    12.4K reads
  2. मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैं

    मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैंजो न मुमकिन रहे वो ख़्वाब तो हैं

    12.4K reads
  3. अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे

    अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसेशाम ढल जाए तो रह-गीर भी घर को तरसे

    12.4K reads
  4. एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने में

    एक उम्र लगती है आशियाँ बनाने मेंऔर पल नहीं लगता बिजलियाँ गिराने में

    12.4K reads
  5. लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है

    लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं हैदिल पर जो किसी इश्क़ की तहरीर नहीं है

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like