मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैं

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

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मेरे हाथों में कुछ गुलाब तो हैं

जो न मुमकिन रहे वो ख़्वाब तो हैं

रंग बिखरे हैं चार-सू मेरे

रेग-ज़ारों में कुछ सराब तो हैं

तेरी चाहत की आरज़ू न सही

हम तिरे साया-ए-इताब तो हैं

लफ़्ज़ ढलने लगे हैं मा'नी में

ज़िंदगी से मिले जवाब तो हैं

रौशनी सी रही दरख़्तों पर

जंगलों पर रहे शबाब तो हैं

रात के मंज़र-ए-ख़मोशी में

छिड़ गए नग़्मा-ए-रबाब तो हैं

इस ज़माने की क्या हक़ीक़त है

साहिल-ए-वक़्त पर हबाब तो हैं

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

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