उन से मिलने का इरादा है क़ज़ा से पहले
क्यूँ न दिल खोल के जी लूँ मैं सज़ा से पहले
इस हवाले से ही शायद उसे पहचान सकूँ
ख़ुद को पहचान लूँ गर अपने ख़ुदा से पहले
ज़र्द मौसम की थी तमसील मिरी आँखों में
रंग कुछ और भी गुज़रे हैं ख़ला से पहले
वक़्त मादूम है और दहर के अंदाज़ जुदा
कुछ भी मुमकिन है मुक़द्दर में क़ज़ा से पहले
तेरी महफ़िल की तरफ़ लौट के जाऊँ कैसे
पूछ तो लूँ दिल-ए-आशुफ़्ता-अदा से पहले
कैसे इस ख़्वाब को टूटा हुआ देखेगी सहर
शौक़ के दीप बुझा दूँ मैं जफ़ा से पहले








