काग़ज़ी फूल खिला रक्खे हैं

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

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काग़ज़ी फूल खिला रक्खे हैं

रिश्ता-ए-दर्द निभा रक्खे हैं

दिल-ए-बर्बाद ने ख़ामोशी से

कितने अरमान सुला रक्खे हैं

रात के पिछले पहर अश्कों से

दीप से दीप जला रक्खे हैं

वो नहीं जानते मगर सच है

तार-ए-दिल उन से मिला रक्खे हैं

वो जो आए तो हज़ारों शिकवे

फिर किसी दिन पे उठा रक्खे हैं

क्या समझ पाएँगे ग़म को मेरे

बुत-कदे में जो ख़ुदा रक्खे हैं

कोई ता'बीर मिले या न मिले

ख़्वाब पलकों पे सजा रक्खे हैं

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

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