शाम आ कर झरोकों में बैठी रहे

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

1 min read · 12.4K reads

शाम आ कर झरोकों में बैठी रहे

साअतों में समुंदर पिरोती रहे

मौसमों के हवाले तिरे नाम से

धूप छाँव मेरे दिल में होती रहे

जी न चाहा तिरी महफ़िलों से उठूँ

बेबसी ख़ाली नज़रों से तकती रहे

तुम ने माँगा है एहसास इस ढंग से

पत्थरों की ख़मोशी पिघलती रहे

यूँ गुज़रते रहें याद के क़ाफ़िले

मेरी गलियों में रौनक़ सी लगती रहे

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

View profile & all 47 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like