न तोड़ो ज़िंदगी रिश्ता जहाँ से

शाइस्ता मुफ़्तीशाइस्ता मुफ़्ती21 Sept 1968

1 min read · 12.4K reads

न तोड़ो ज़िंदगी रिश्ता जहाँ से

मिलेगा फिर कोई साथी कहाँ से

जफ़ाएँ हों कि दुख रख लो ख़ुशी से

कि बेहतर हैं ये उम्र-ए-राएगाँ से

बहारों से न इतना दिल लगाओ

कि वहशत हो चले तुम को ख़िज़ाँ से

वो मंज़र रेत के साहिल में गुम हैं

यही उम्मीद थी आब-ए-रवाँ से

ये आँखें ग़म से बोझल हो चली हैं

उतर आए मसीहा आसमाँ से

मिरी ख़ामोशियाँ मुजरिम बनीं हैं

सबब होगा अदा कैसे ज़बाँ से

शाइस्ता मुफ़्ती
About the poet

शाइस्ता मुफ़्ती

जन्म : 21 Sep 1968 | कराची, सिंध

View profile & all 47 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डी