जोत-कोड़ डालो इस परती आदमी-ज़मीन को
लोहे के तेज़ फाल से तोड़-तोड़ डालो
नंगी धूप तप्त खेत
देह-दरिया कीचड़-मिट्टी गूँध कर छींट दो धान
सूखी मिट्टी में पटाओ धारसार पानी
लबालब पानी लाओ कि भर जाए
चैत की दरकी ज़मीन
पानी लाओ, तोड़ो नदी-नाले गड्ढे-ताल
मिट्टी को धूल बना बिजड़ा रोपो
बड़ी जिद्दी है धान वाली ज़मीन
किस टोपरे में क्या रोपोगे
आहू-शालि या बाडआमना—सब में छीना-झपटी
मचलते हैं सब
जोत कोड़ डालो आदमी-ज़मीन
ख़ून-पसीने का खेत।








