कविता

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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जोत-कोड़ डालो इस परती आदमी-ज़मीन को

लोहे के तेज़ फाल से तोड़-तोड़ डालो

नंगी धूप तप्त खेत

देह-दरिया कीचड़-मिट्टी गूँध कर छींट दो धान

सूखी मिट्टी में पटाओ धारसार पानी

लबालब पानी लाओ कि भर जाए

चैत की दरकी ज़मीन

पानी लाओ, तोड़ो नदी-नाले गड्ढे-ताल

मिट्टी को धूल बना बिजड़ा रोपो

बड़ी जिद्दी है धान वाली ज़मीन

किस टोपरे में क्या रोपोगे

आहू-शालि या बाडआमना—सब में छीना-झपटी

मचलते हैं सब

जोत कोड़ डालो आदमी-ज़मीन

ख़ून-पसीने का खेत।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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