कहीं भी गद्य का उजाला नहीं है
बहुत फ़ीकी पड़ गई मेरी कविता
सीना खोद कर निकाल लाओ ख़ून, पसीना और प्रेम
मेरा वह ताज़गी-भरा खनिज
अपने स्पर्श से जला दो मेरी हड्डियों का समिध
दो आँखों की धाराओं तक काट लाओ नदी की पागल धारा
ख़ून से भी अधिक दीप्त
बोध-शक्ति की सूखी कोशिकाओं में आने दो बाढ़ की उर्वरता
खाद मिले रक्तवर्ण कमल के बीज को।








