बीज

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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कहीं भी गद्य का उजाला नहीं है

बहुत फ़ीकी पड़ गई मेरी कविता

सीना खोद कर निकाल लाओ ख़ून, पसीना और प्रेम

मेरा वह ताज़गी-भरा खनिज

अपने स्पर्श से जला दो मेरी हड्डियों का समिध

दो आँखों की धाराओं तक काट लाओ नदी की पागल धारा

ख़ून से भी अधिक दीप्त

बोध-शक्ति की सूखी कोशिकाओं में आने दो बाढ़ की उर्वरता

खाद मिले रक्तवर्ण कमल के बीज को।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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