कठोरता से ठोकर खाकर लौट आती है कवि की आवाज़,
प्रतिद्वंद्वीविहीन
क़लम के सामने काँपती है प्रतिश्रुत कविता, कवि का अस्तित्व
स्नायुभार से पीड़ित अंतहीन कवि का नातिउच्च स्वर में शोक का श्लोक,
शिल्प की स्वाधीनता...
मुझे यह कविता ख़त्म करने दो इच्छानुसार
रक्त की वाणी विवस्त्र देह के अनचाहेपन में छटपटा कर मरती है
हाथ में भविष्य की अद्भुत पताका
मुझे अभय-दान दो परिचित शब्दों की जड़ता तोड़ हथौड़े से
चूर-चूर करने की, या फिर रक्तहीनता से मृतप्राय निष्फल यथार्थ को
टुकड़े-टुकड़े करती दुर्धर्ष तलवार की विलक्षण तेजस्विता।








