दरिया

हरभजन सिंहहरभजन सिंह

1 min read · 12.4K reads

मैं जिस दरिया का गला घोंटकर

शहर से परे जंगल में फेंक आई हूँ

मुझे संदेह है

वह अभी भी जीवित है

जब भी होश संभालेगा

मेरी तलाश में

अंधड़ की भाँति, हमारे शहर आएगा

लेकिन मुझे नहीं ढूँढ पाएगा

मैंने अपने शरीर पर

अब एक और चेहरा जड़ लिया है

वह सारे शहर को

दलदल समझकर पार कर जाएगा।

हरभजन सिंह
About the poet

हरभजन सिंह

पंजाबी के सुप्रतिष्ठित कवि, आलोचक, अनुवादक और संस्कृति-समीक्षक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 18 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like