मैं जिस दरिया का गला घोंटकर
शहर से परे जंगल में फेंक आई हूँ
मुझे संदेह है
वह अभी भी जीवित है
जब भी होश संभालेगा
मेरी तलाश में
अंधड़ की भाँति, हमारे शहर आएगा
लेकिन मुझे नहीं ढूँढ पाएगा
मैंने अपने शरीर पर
अब एक और चेहरा जड़ लिया है
वह सारे शहर को
दलदल समझकर पार कर जाएगा।








