पृथ्वी मेरी कविता

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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मेरी क़लम लोहार के हाथ का हथौड़ा, ठोंक-पीट कर बनाता हूँ शब्द

किसान के फाल जैसा पैना; हलरेखा में सोने की सीता,

बढ़ई की आरी-सा क्रूर;

सख़्त लकड़ी के रेशे चीर कर लाता हूँ खींच

अनुभव के ख़ून से रँगे हुए शब्द, चाउँताल मर्द के धनुषवाण-सा

लक्ष्यभेदी एक-एक शब्द मेरे रक्त-माँस की इच्छा में तीव्र हो उठता,

उनमें से कोई पर्वत-सा उद्धत, कोई नदी-सा नत,

कोई झील-सा गंभीर

किसी के कहने पर उठता-बैठता नहीं

नद-नदी, पर्वत-चित्रित विपुल महादेश का मैं कवि

पृथ्वी मेरी कविता।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

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