मेरी क़लम लोहार के हाथ का हथौड़ा, ठोंक-पीट कर बनाता हूँ शब्द
किसान के फाल जैसा पैना; हलरेखा में सोने की सीता,
बढ़ई की आरी-सा क्रूर;
सख़्त लकड़ी के रेशे चीर कर लाता हूँ खींच
अनुभव के ख़ून से रँगे हुए शब्द, चाउँताल मर्द के धनुषवाण-सा
लक्ष्यभेदी एक-एक शब्द मेरे रक्त-माँस की इच्छा में तीव्र हो उठता,
उनमें से कोई पर्वत-सा उद्धत, कोई नदी-सा नत,
कोई झील-सा गंभीर
किसी के कहने पर उठता-बैठता नहीं
नद-नदी, पर्वत-चित्रित विपुल महादेश का मैं कवि
पृथ्वी मेरी कविता।








